“एक बार वक्फ घोषित हुआ तो मामला खत्म!” – वक्फ संशोधन कानून 2025 पर सुप्रीम कोर्ट में तकरार
Supreme Court on Waqf Amendment Act 2025: लोकसभा और राज्यसभा में पारित होने के बाद वक्फ संशोधन विधेयक 2025 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। इसके साथ ही देशभर में यह कानून लागू हो चुका है। लेकिन अब इस कानून की वैधानिकता पर सवाल उठाते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती – कौन हैं याचिकाकर्ता?
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, AAP विधायक अमानतुल्लाह खान, जमियत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी समेत कम से कम 10 संगठनों और व्यक्तियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
मुख्य तर्क: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लंघन है और मुस्लिमों के धार्मिक अधिकारों को कुचलने की कोशिश है।
चर्चा में आए सुप्रीम कोर्ट के तीन ऐतिहासिक फैसले
1. रतीलाल पानचंद गांधी बनाम स्टेट ऑफ बॉम्बे (1954)
इस फैसले में धार्मिक संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण को असंवैधानिक ठहराया गया था। अदालत ने कहा था कि यह धार्मिक अधिकारों पर आक्रमण है।
2. सय्यद अली बनाम आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड (1998)
कोर्ट ने वक्फ को इस्लामी दान की स्थायी और धार्मिक व्यवस्था माना और कहा कि एक बार वक्फ घोषित होने पर संपत्ति हमेशा वक्फ ही रहती है।
3. के. नागराज बनाम आंध्र प्रदेश (1985)
हालांकि यह केस वक्फ से सीधा जुड़ा नहीं था, कोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि अगर कोई संशोधन कानून के मूल उद्देश्य को निष्क्रिय कर दे, तो वह असंवैधानिक होगा।
क्या कहती है नई याचिका?
याचिका में कहा गया है कि 2025 संशोधन कानून की 35 से अधिक धाराएं 1995 के वक्फ अधिनियम के मूल उद्देश्य का उल्लंघन करती हैं। इससे वक्फ संपत्तियों का धार्मिक नियंत्रण कमजोर होता है।
निष्कर्ष:
अब देश की सर्वोच्च अदालत तय करेगी कि वक्फ संशोधन कानून 2025 संविधान की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं। साथ ही यह केस भारत में धर्म और कानून के रिश्ते को भी नई दिशा दे सकता है।

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