छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक मंच तक पहुंचाने वाली पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनकी दमदार आवाज, प्रभावशाली मंच प्रस्तुति और महाभारत की जीवंत कथाओं ने भारतीय लोककला को नई पहचान दिलाई। उनके निधन से देशभर में शोक की लहर दौड़ गई है।
रायपुर एम्स में ली अंतिम सांस
छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का शनिवार देर रात करीब 3:15 बजे रायपुर स्थित एम्स में निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। उनके निधन की खबर सामने आते ही कला, साहित्य और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर फैल गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जताया शोक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. तीजन बाई ने अपनी अद्भुत प्रस्तुतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की पंडवानी लोककला को विश्वभर में नई पहचान दिलाई। उन्होंने कहा कि उनका निधन कला एवं संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। प्रधानमंत्री ने शोक संतप्त परिवार और उनके प्रशंसकों के प्रति अपनी संवेदनाएं भी व्यक्त कीं।
पंडवानी को दिलाई वैश्विक पहचान
डॉ. तीजन बाई ने महाभारत की कथाओं को अपनी विशिष्ट गायन शैली, अभिनय और मंचीय प्रस्तुति के माध्यम से जीवंत बना दिया। उन्होंने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला को गांवों की चौपाल से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उनकी प्रस्तुतियों ने न केवल भारत बल्कि दुनिया के कई देशों में भी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का परिचय कराया।
उनके कला-साधना और लोक संस्कृति में योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और बाद में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया था। वे लोककला की ऐसी प्रतिनिधि रहीं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा से अनेक पीढ़ियों को प्रेरित किया।
पैतृक गांव गनियारी में होगा अंतिम संस्कार
परिजनों के अनुसार डॉ. तीजन बाई का अंतिम संस्कार आज उनके पैतृक गांव गनियारी में किया जाएगा। उनके अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में कलाकार, प्रशंसक और विभिन्न क्षेत्रों के लोग पहुंचने की संभावना है। छत्तीसगढ़ सरकार और कई सांस्कृतिक संस्थाओं ने भी उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।
डॉ. तीजन बाई का जाना केवल एक महान लोकगायिका का निधन नहीं, बल्कि भारतीय लोककला की एक अमूल्य विरासत का खो जाना है। उनकी आवाज, उनकी प्रस्तुति और पंडवानी के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा। भारतीय संस्कृति के इतिहास में उनका योगदान सदैव स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।
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