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मुंबई कबूतरखाना विवाद: जैन संत ने 13 अगस्त से अनिश्चितकालीन उपवास की दी चेतावनी

मुंबई कबूतरखाना विवाद: जैन संत ने 13 अगस्त से अनिश्चितकालीन उपवास की चेतावनी

मुंबई कबूतरखाना विवाद: जैन संत ने 13 अगस्त से अनिश्चितकालीन उपवास की चेतावनी

Main Points (English)

  • The Mumbai Brihanmumbai Municipal Corporation (BMC) shut down the Dadar Kabutarkhana, a traditional pigeon-feeding site, following a Bombay High Court order citing public health concerns.
  • The Supreme Court upheld the High Court’s decision, intensifying the controversy.
  • Jain monk Muni Nileshchandra Vijay announced an indefinite hunger strike starting August 13, warning he might take up arms if religious rights are violated.
  • The Jain community considers pigeon feeding a sacred religious practice symbolizing non-violence and compassion.
  • BMC cites health risks from pigeon droppings and damage to heritage structures as reasons for the ban.
  • Political leaders have mixed reactions, with calls for balancing religious sentiments and public health.
  • The controversy highlights tensions between religious freedom and urban public health priorities.

मुंबई में कबूतरों को खिलाने पर लगी पाबंदी ने एक बड़ा सामाजिक और धार्मिक विवाद जन्म दे दिया है। दादर कबूतरखाना, जो दशकों से जैन समुदाय सहित कई लोगों के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, को ब्रिहन्मुम्बई महानगर पालिका (बीएमसी) ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद बंद कर दिया है। इस आदेश के पीछे मुख्य वजह सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंताएं बताई गई हैं, जिसमें कबूतरों की बड़ी संख्या से संक्रामक रोग फैलने की संभावना और ऐतिहासिक स्थलों को कबूतरों के मल से होने वाला नुकसान शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है, जिससे विवाद और भी गंभीर हो गया है।

जैन समुदाय की प्रतिक्रिया और चेतावनी

इस पाबंदी को लेकर जैन समुदाय में भारी आक्रोश है। मुनि निलेशचंद्र विजय, जो इस समुदाय के प्रमुख संतों में से एक हैं, ने 13 अगस्त से मुंबई में अनिश्चितकालीन उपवास शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने साफ कहा है कि उनका उद्देश्य शांतिपूर्ण विरोध है, लेकिन यदि सरकार ने उनकी धार्मिक आस्था का अपमान जारी रखा, तो वे तैयार हैं।

उनका कहना है कि कबूतरों को खिलाना जैन धर्म का एक पवित्र कर्म है, जिसमें अहिंसा और जीवों के प्रति करुणा का संदेश छुपा है। इस परंपरा को खत्म करना न केवल धार्मिक अधिकारों का हनन है, बल्कि यह समुदाय के मनोबल को भी ठेस पहुंचाता है।

बीएमसी की दलीलें

बीएमसी का तर्क है कि कबूतरों की बड़ी संख्या स्वास्थ्य जोखिम पैदा करती है। कबूतरों के मल में रोगजनक बैक्टीरिया होते हैं, जो इंसानों में संक्रमण फैला सकते हैं। इसके अलावा, कबूतरखाना के आसपास की इमारतें और सार्वजनिक संपत्तियां कबूतरों के मल से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो रही हैं, जिससे सार्वजनिक धन का नुकसान हो रहा है। बीएमसी ने यह भी कहा है कि उन्होंने कबूतरों की देखभाल के लिए वैकल्पिक जगहों पर विचार किया है, लेकिन धार्मिक भावनाओं के मद्देनजर एक संतुलित निर्णय लेना चुनौतीपूर्ण है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

इस मुद्दे पर राजनीति भी गर्मा गई है। भाजपा के मुंबई के मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने कहा है कि धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना जरूरी है। उन्होंने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की अपील की है।

वहीं, कांग्रेस और एनसीपी ने राज्य सरकार की आलोचना करते हुए इसे धार्मिक समुदायों के प्रति असंवेदनशील बताया है। उन्होंने कहा है कि धार्मिक भावनाओं की उपेक्षा से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है, और सरकार को इस मामले में संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव

मुंबई की इस कबूतरखाना परंपरा की शुरुआत कई दशक पहले हुई थी और यह न केवल जैन समुदाय बल्कि अन्य धार्मिक और सामाजिक समूहों के लिए भी एक सांस्कृतिक पहचान रही है। कबूतरखाना में हर दिन सैकड़ों लोग कबूतरों को अनाज खिलाने आते हैं, जो कई लोगों के लिए एक आध्यात्मिक और मानसिक शांति का स्रोत है।

अब इस पर पाबंदी लगने से न केवल कबूतरों की स्थिति दयनीय हो गई है, बल्कि उन लोगों की धार्मिक आज़ादी पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है। कबूतरों की भूख और उनका विलुप्त होना भी चिंता का विषय बन गया है।

आगे का रास्ता

मुनि निलेशचंद्र विजय के अनिश्चितकालीन उपवास की शुरूआत के बाद स्थिति और तनावपूर्ण हो सकती है। सामाजिक संगठनों, प्रशासन और धार्मिक समुदायों के बीच संवाद की आवश्यकता पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है ताकि इस विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सके।

यह मामला शहर के लिए एक चुनौती है कि वह धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच कैसे सामंजस्य स्थापित करता है। इसके समाधान में संवेदनशीलता, समझदारी और न्यायसंगत दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

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