जलियांवाला बाग हत्याकांड : जहां धरती भी रो पड़ी थी…
13 अप्रैल 1919 भारत के इतिहास का सबसे दर्दनाक और काला दिन माना जाता है। अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग उस समय खून से लाल हो गया जब निर्दोष और निहत्थे भारतीयों पर अंग्रेजी सेना ने मौत की बारिश कर दी।
क्या था जलियांवाला बाग हत्याकांड?
यह घटना ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किए गए रॉलेट एक्ट के विरोध में हुई सभा पर हुई थी। इस कानून के विरोध में हजारों लोग जलियांवाला बाग में एकत्र हुए थे। लेकिन जनरल डायर ने वहां पहुंचकर बाग को घेर लिया और अंधाधुंध गोलियां चलवाईं।
भावनात्मक घटनाएं जो दिल तोड़ देती हैं
- सैकड़ों लोग जान बचाने के लिए बाग के कुएं में कूद गए। एक मां अपनी बच्ची को लेकर कुएं में कूदी। बाद में मां की छाती से बच्ची की टूटी हुई कलाई चिपकी मिली।
- एक 6 साल का बच्चा अपने पिता की लाश से लिपटा मिला और कह रहा था — “उठो ना बाबा… घर चलो…”
जनरल डायर की क्रूरता
डायर ने बाग के मुख्य द्वार को बंद कर दिया ताकि कोई बाहर न भाग सके। गोलियां तब तक चलाई गईं जब तक सैनिकों की बंदूकें खाली नहीं हो गईं।
आज भी मौजूद हैं दर्द के निशान
आज जलियांवाला बाग एक राष्ट्रीय स्मारक है। यहां आज भी गोलियों के निशान और वह कुआं सुरक्षित है जिसमें सैकड़ों लोगों ने जान दी थी।
यह घटना क्यों है महत्वपूर्ण?
यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक मोड़ बनी। इस घटना ने पूरे देश को एकजुट कर दिया। महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया और रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी।
नमन है उन शहीदों को जिनकी कुर्बानी कभी भुलाई नहीं जा सकती।
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