जालना:
जालना महानगरपालिका चुनाव से पहले सत्तारूढ़ महायुति में फैसले की देरी ने जिले की राजनीति को गरमा दिया है। लगातार दो महीनों से चल रही गठबंधन वार्ताओं के बावजूद अंतिम निर्णय न हो पाने से चुनावी समीकरण उलझते नजर आ रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में शिवसेना के उपनेता एवं विधायक अर्जुन खोतकर ने संकेत दिए हैं कि यदि समय रहते भाजपा की ओर से स्पष्ट रुख सामने नहीं आता, तो वे अन्य दलों को साथ लेकर अलग मोर्चा—‘शहर विकास आघाड़ी’—खड़ा करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
महायुति को लेकर शिवसेना की ओर से लगातार सकारात्मक प्रयास किए गए। हाल ही में इच्छुक उम्मीदवारों की मुलाकातें भी हुईं और भाजपा की ओर से निर्णय जल्द लेने का भरोसा दिलाया गया था। हालांकि नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अंतिम तिथि 30 दिसंबर (दोपहर 3 बजे) नजदीक आने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सीमित समय और बढ़ते दबाव के बीच भाजपा की चुप्पी ने राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया है।
राष्ट्रवादी का रुख स्पष्ट, सभी विकल्प खुले
इसी बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) के जिलाध्यक्ष एवं पूर्व विधायक अरविंद चव्हाण ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। उनका कहना है कि यदि महायुति का स्वरूप तय नहीं होता, तो पार्टी के लिए अन्य सभी राजनीतिक विकल्प खुले रहेंगे। इस बयान के बाद यह संकेत और मजबूत हो गए हैं कि जालना में पारंपरिक गठबंधनों से इतर नई राजनीतिक संरचना उभर सकती है।
‘शहर विकास आघाड़ी’ की चर्चा ने पकड़ा जोर
भाजपा की ओर से निर्णय में देरी के बीच अन्य दलों और स्थानीय नेताओं की गतिविधियां तेज हो गई हैं। सूत्रों के अनुसार, ‘शहर विकास आघाड़ी’ के गठन को लेकर अनौपचारिक बातचीत शुरू हो चुकी है। माना जा रहा है कि यदि भाजपा समय रहते गठबंधन पर मुहर नहीं लगाती, तो अर्जुन खोतकर विभिन्न दलों और स्थानीय ताकतों को साथ लेकर अलग मोर्चा खड़ा कर सकते हैं। यह मोर्चा विकास के मुद्दों को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ने का दावा कर सकता है।
सिंधुदुर्ग पैटर्न पर ‘तीसरा प्लान’ सक्रिय
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि शिवसेना ने अब ‘तीसरा प्लान’ सक्रिय करने की तैयारी कर ली है। बताया जा रहा है कि यह रणनीति सिंधुदुर्ग मॉडल की तर्ज पर होगी, जहां भाजपा के खिलाफ व्यापक राजनीतिक एकजुटता बनाई गई थी। जालना में शिवसेना–भाजपा गठबंधन को लेकर दो अहम बैठकें हुईं—एक स्थानीय नेताओं की और दूसरी भाजपा के वरिष्ठ नेता चंद्रशेखर बावनकुळे के साथ—लेकिन इन बैठकों से भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका।
अंदरूनी मतभेद भी बने बाधा
गठबंधन में देरी के पीछे अंदरूनी राजनीतिक मतभेद भी बड़ी वजह माने जा रहे हैं। जालना में पूर्व विधायक कैलास गोरंट्याल और अर्जुन खोतकर के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक मतभेदों ने सहमति की राह को और कठिन बना दिया है। महापौर पद के उम्मीदवार की घोषणा और आपसी अविश्वास के कारण बातचीत निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच पा रही है।
त्रिकोणीय मुकाबले की प्रबल संभावना
उधर, महाविकास आघाड़ी के घटक दलों में भी सीटों के बंटवारे को लेकर बैठकों का दौर जारी है। यदि समय रहते किसी भी गठबंधन में स्पष्टता नहीं आती, तो जालना महापालिका चुनाव में भाजपा, शिवसेना–राष्ट्रवादी और महाविकास आघाड़ी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला तय माना जा रहा है। ऐसे में हर दल अपनी-अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुट गया है।
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए अरविंद चव्हाण ने बताया कि पार्टी महायुति के पक्ष में है और इसी सिलसिले में भाजपा के वरिष्ठ नेता रावसाहेब दानवे से भी मुलाकात हुई है। उन्होंने कहा, “शिवसेना की ओर से सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन भाजपा की ओर से अब तक स्पष्टता नहीं आई है। यदि महायुति नहीं बनती, तो राष्ट्रवादी के लिए सभी विकल्प खुले हैं।”
कुल मिलाकर, नामांकन की समय-सीमा नजदीक आते ही भाजपा की खामोशी और शिवसेना के आक्रामक संकेतों ने जालना की राजनीति को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। अब आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि जालना महापालिका चुनाव किस राजनीतिक धुरी पर लड़ा जाएगा।

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