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जालना में आवारा कुत्तों के हमले में दो मासूम बच्चियों की मौत — नागरिकों का गुस्सा, प्रशासन से जवाब की मांग

आवारा कुत्तों के हमले में दो मासूम बच्चियों की दर्दनाक मौत से जालना में उबाल — प्रशासन की लापरवाही पर जनता फूटी, “कब जागेगा सिस्टम?”

जालना: शहर में आवारा कुत्तों के हमले में दो नन्हीं बच्चियों की मौत ने पूरे जालना को हिला दिया है। दिवाली के बाद का यह सप्ताह जालना के लिए शोक और गुस्से का प्रतीक बन गया है। हर गली-मोहल्ले में मातम पसरा है और नागरिक प्रशासन की लापरवाही पर सवाल उठा रहे हैं।

यह दर्दनाक घटना पैठण रोड क्षेत्र में घटी, जहां 3 वर्षीय परी दीपक गोस्वामी और 7 वर्षीय संध्या पाटोले अपने घर के पास खेल रही थीं। तभी आवारा कुत्तों के झुंड ने उन पर हमला कर दिया। आसपास के लोगों ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दोनों बच्चियों ने अस्पताल में दम तोड़ दिया।

शहर में आक्रोश और भय का माहौल

घटना की खबर फैलते ही शहर में गुस्से की लहर दौड़ गई। माता-पिता ने अपने बच्चों को बाहर खेलने भेजना बंद कर दिया है। सोशल मीडिया पर #JusticeForPari और #JusticeForSandhya जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे हैं। नागरिकों का कहना है कि प्रशासन की लापरवाही ने दो निर्दोष जिंदगियाँ निगल लीं।

मौन प्रदर्शन और नागरिकों की आवाज

शुक्रवार, 24 अक्टूबर की शाम छत्रपति शिवाजी महाराज चौक पर हजारों नागरिकों और करीब 25 सामाजिक संस्थाओं ने मौन प्रदर्शन किया। नागरिकों ने मोमबत्तियाँ जलाकर बच्चियों को श्रद्धांजलि दी और प्रशासन के खिलाफ शांत लेकिन तीखा विरोध जताया।

“क्या हमारी बच्चियों की सुरक्षा की कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या तीसरे हादसे का इंतज़ार है?” — प्रदर्शनकारियों का सवाल

प्रदर्शन के बाद नागरिकों ने पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन (प्रस्ताव) सौंपा। इसमें कहा गया कि अवैध मांस दुकानों की वजह से आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ी है। इन दुकानों से बाहर फेंके जाने वाले मांस के टुकड़े और कचरे के कारण कुत्ते आक्रामक हो रहे हैं और निर्दोष बच्चे शिकार बन रहे हैं।

मुख्य मांगें

  • शहर की सभी अवैध और बिना लाइसेंस मांस दुकानों को तत्काल बंद किया जाए।
  • दुकानदारों पर IPC और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत मामला दर्ज किया जाए।
  • आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण अभियान तत्काल शुरू किया जाए।
  • स्थायी आश्रय गृह (डॉग शेल्टर) की व्यवस्था की जाए।
  • इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की जाए।
  • रहवासी इलाकों और स्कूलों के पास पुलिस गश्त बढ़ाई जाए।

नागरिकों ने महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 64(क) और 66(ग) का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस का कर्तव्य है। परंतु प्रशासन इस जिम्मेदारी में विफल रहा है।

संस्थाओं का एकजुट विरोध

इस आंदोलन में जालना फर्स्ट, क्रेडाई, विप्र फाउंडेशन, समस्त महाजन, रोटरी क्लब ऑफ जालना, कैलास ब्रिगेड, मेकिंग जालना बेटर फाउंडेशन, अन्नामृत फाउंडेशन, सहकार भारती, भारतीय जैन संगठन, प्राणीमित्र संघ, उड़ान ग्रुप समेत 25 से अधिक संगठनों ने भाग लिया।

मंच पर बच्चियों की तस्वीरें रखकर श्रद्धांजलि दी गई। एक माँ ने रोते हुए कहा — “आज ये दो बच्चियाँ गईं, कल कोई और जाएगी… लेकिन क्या प्रशासन तब भी चुप रहेगा?”

प्रशासन पर बढ़ता दबाव

जनता के दबाव के बाद पुलिस अधीक्षक ने ज्ञापन स्वीकार करते हुए आश्वासन दिया कि कार्रवाई की जाएगी। वहीं नगर पालिका ने भी डॉग कैप्चर और नसबंदी अभियान शुरू करने की बात कही है।

हालाँकि नागरिकों ने कहा है कि अब उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि कार्रवाई चाहिए। अगर प्रशासन जल्द ठोस कदम नहीं उठाता, तो यह आंदोलन शहरव्यापी मुहिम का रूप लेगा।

जालना आज सिर्फ शोक में नहीं, बल्कि चेतावनी में है — अगर दो मासूमों की मौत भी प्रशासन को नहीं जगा पाई, तो आने वाले दिनों में हर माता-पिता को डर के साथ जीना पड़ेगा।


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