UN में सितंबर में फिलीस्तीन को मान्यता देगा ऑस्ट्रेलिया — बदलते वैश्विक रुख में नई कड़ी
कैनबरा / संयुक्त राष्ट्र · 11 अगस्त 2025
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने घोषणा की है कि उनकी सरकार आगामी सितंबर 2025 में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में फिलीस्तीन को औपचारिक रूप से मान्यता देगी। यह निर्णय वैश्विक कूटनीति में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है और पश्चिमी देशों के बदलते रुख में ऑस्ट्रेलिया को एक नई कड़ी के रूप में जोड़ता है।
फैसले की शर्तें और मकसद
प्रधानमंत्री ने कहा कि मान्यता फिलीस्तीनी प्राधिकरण से प्राप्त कुछ विशेष प्रतिबद्धताओं पर आधारित होगी — जिसमें हमास को शासन से अलग रखना, गाज़ा का असैन्यीकरण, पारदर्शी और लोकतांत्रिक चुनाव कराना और उग्रवादी गतिविधियों से जुड़े वित्तीय सहयोग को रोकना शामिल है। सरकार का दावा है कि यह कदम मध्यमार्गी नेतृत्व को मज़बूत करेगा और दो-राष्ट्र समाधान को पुनर्जीवित करने का सकारात्मक राजनीतिक संकेत देगा।
अंतरराष्ट्रीय और घरेलू प्रतिक्रियाएँ
इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस निर्णय की कड़ी आलोचना की और इसे “अनुचित” बताया। ऑस्ट्रेलिया के विपक्षी दलों और कुछ यहूदी-आधारित समुदायों ने भी सुरक्षा संबंधी चिंताएँ जताईं।
वहीं, ऑस्ट्रेलियन ग्रीन्स और कई नागरिक समाज समूहों ने इस कदम का स्वागत किया है, उन्हें यह “लंबे समय से अपेक्षित” और “नैतिक तौर पर सही” बताते हुए माना कि मान्यता से फिलीस्तीनियों के आत्मनिर्णय का समर्थन होगा।
मानवीय-नैतिक तर्क (फिलीस्तीन के पक्ष में)
गाज़ा में जारी मानवीय संकट — जिसमें भोजन, पानी और चिकित्सा संसाधनों की कमी, व्यापक विस्थापन और बच्चों पर प्रभाव शामिल है — ने अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति बढ़ाई है। मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें इसे गंभीर मानवीय आपदा के रूप में प्रस्तुत कर चुकी हैं।
कानूनी और ऐतिहासिक पहलू
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और अन्य अंतरराष्ट्रीय निकायों ने कब्ज़े और बस्तियों के निर्माण पर चिंता व्यक्त की है। 2012 में फिलीस्तीन को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा ‘गैर-सदस्य पर्यवेक्षक राज्य’ का दर्जा मिल चुका है — यह कूटनीतिक मान्यता का एक उल्लेखनीय चरण था।
विस्तृत तालिका — हालिया मान्यताओं का अवलोकन
| वर्ष / श्रेणी | उदाहरण देश (प्रमुख) |
|---|---|
| 1988–2010 | भारत, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील |
| 2024 | आयरलैंड, नॉर्वे, स्पेन, स्लोवेनिया, आर्मेनिया |
| 2025 (घोषित) | फ्रांस, यूके, माल्टा, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मेक्सिको |
| कुल मान्यता (मध्यम 2025) | लगभग 147–148 देशों तक |
नोट: वास्तविक संख्या समय के साथ बदल सकती है; यह रिपोर्ट जुलाई–अगस्त 2025 तक की सार्वजनिक घोषणाओं और मीडिया कवरेज पर आधारित सार है।
विश्लेषण — क्या बदलेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिमी देशों द्वारा मान्यता की यह लहर राजनीतिक संदेश देती है: दो-राष्ट्र समाधान के लिए वैश्विक समर्थन बढ़ रहा है और अब कई सरकारें इसे केवल अंतिम शांति समझौते तक सीमित नहीं रखना चाहतीं।
हालाँकि, एक प्रभावी और टिकाऊ शांति के लिए जरूरी है कि यह मान्यता कूटनीतिक दबाव, विकास सहायता, सुरक्षा गारंटी और वास्तविक वार्ता में तब्दील हो—न कि केवल प्रतीकात्मक क़दम बनकर रह जाए।







































































































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