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भोकरदन से पोंपेई और कोल्हापुर तक — भारत के प्राचीन व्यापार और सांस्कृतिक प्रभाव के जीवंत प्रमाण

भोकरदन से पोंपेई और कोल्हापुर तक — रोमन साम्राज्य में छाया था भारत का व्यापार

यक्षिणी और पोसायडन जैसी मूर्तियां बनीं प्रमाण

जालना: महाराष्ट्र के जालना जिले का एक ऐतिहासिक शहर भोकरदन अब वैश्विक इतिहास के मानचित्र पर विशेष महत्व रखता है। यह स्थान न केवल प्राचीन भारतीय संस्कृति का एक केंद्र रहा, बल्कि भारत और रोमन साम्राज्य के बीच हुए ऐतिहासिक व्यापार के चमत्कारी प्रमाणों से भी जुड़ा है।

आज से करीब 2000 वर्ष पूर्व की एक हाथीदांत की मूर्ति, जो इटली के पोंपेई शहर में प्राप्त हुई थी, वह मूर्ति या तो भोकरदन में बनी थी या कम से कम उससे प्रेरित थी।

प्राचीन व्यापार का प्रमाण: भोकरदन की यक्षिणी और पोंपेई लक्ष्मी

ईसा पूर्व 200 वर्षों के आसपास भारत वैश्विक निर्यातक शक्ति था। इटली के पोंपेई शहर में अक्टूबर 1938 में मिली “पोंपेई लक्ष्मी” की मूर्ति भारतीय कला की गवाही देती है। यह मूर्ति हाथी दांत से बनी थी और विशेषज्ञों का मत है कि यह मूर्ति भोकरदन या मथुरा में बनी हो सकती है।

इसके साथ मिले सातवाहन काल के राजा वशिष्ठिपुत्र पुलुमावी के सिक्के इस बात का प्रमाण हैं कि यह मूर्ति समुद्री मार्ग से भारत से पोंपेई पहुँची।

कोल्हापुर के ब्रह्मपुरी में मिला ग्रीक देवता पोसायडन

1945-46 में कोल्हापुर के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में खुदाई के दौरान ग्रीक समुद्र देवता पोसायडन की 7 इंच की कांस्य प्रतिमा प्राप्त हुई। माना जाता है कि इसे ग्रीस के अलेक्जेंड्रिया में बनाया गया था। यह ग्रीक व्यापारियों की भारत में मौजूदगी को प्रमाणित करता है।

भारत में रोमन सिक्कों की भरमार

भारत में 6000 से अधिक प्राचीन रोमन सिक्के मिले हैं, जो भारत की व्यापारिक समृद्धि का प्रमाण हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार प्लिनी द एल्डर ने लिखा था कि “हमारी रोमन महिलाएं भारतीय वस्त्रों की दीवानी हैं और इसके बदले हमें भारत को सोना देना पड़ता है।”

वेस्ट कोस्ट पोर्ट्स और स्पाइस रूट

भडोच, नालासोपारा, चौल, कल्याण जैसे बंदरगाह उस समय अंतरराष्ट्रीय व्यापार के केंद्र थे। यहां से मसाले, हाथीदांत, रत्न, वस्त्र यूरोप भेजे जाते थे जबकि यूरोप से मामूली वस्तुएं आयात होती थीं।

G20 और IMEEC — प्राचीन मार्ग की पुनरावृत्ति

G20 सम्मेलन 2023 में IMEEC (India-Middle East-Europe Economic Corridor) की घोषणा भारत के प्राचीन व्यापारी मार्गों की पुनरावृत्ति है। इतिहासकारों के अनुसार यह वही मार्ग है जिससे भारत की व्यापारिक समृद्धि फैली थी।

निष्कर्ष:

भारत का प्राचीन व्यापार सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कृति, कला और आस्था का वैश्विक परिचायक था। भोकरदन की यक्षिणी, पोंपेई लक्ष्मी, पोसायडन की मूर्ति और हजारों रोमन सिक्के बताते हैं कि भारत न केवल विश्वगुरु था, बल्कि विश्वव्यापारी भी था।


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Imran Siddiqui

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