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भारत पर कर्ज का बोझ: मोदी सरकार बनाम मनमोहन सरकार, आंकड़े चौंका देंगे!

Debt burden on India: Modi government vs Manmohan government, the figures will shock you!

बजट 2025 के बीच बड़ा सवाल – कितने कर्ज में डूबा है भारत?

The big question during Budget 2025 – How much debt is India in?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट 2025 पेश किए जाने के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि भारत पर कुल कितना कर्ज है और यह किस सरकार के दौरान ज्यादा बढ़ा। मौजूदा समय में भारत के बजट का लगभग 20% हिस्सा सिर्फ कर्ज के ब्याज को चुकाने में खर्च हो जाता है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार और नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार के कार्यकाल में कर्ज कितना बढ़ा? आइए, आंकड़ों के आधार पर इसकी गहरी पड़ताल करते हैं।



भारत कैसे और कहां से लेता है कर्ज?

भारत सरकार कई स्रोतों से कर्ज लेती है, जिनमें घरेलू और विदेशी दोनों प्रकार के ऋण शामिल होते हैं।

घरेलू कर्ज भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), बीमा कंपनियों, कॉरपोरेट कंपनियों और अन्य भारतीय बैंकों से लिया जाता है। वहीं, विदेशी कर्ज अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से लिया जाता है।

वर्तमान में भारत पर कुल विदेशी कर्ज 712 अरब डॉलर (करीब 59 लाख करोड़ रुपये) है। भारत की कुल जनसंख्या 1.40 अरब होने के कारण, हर भारतीय नागरिक पर औसतन 5 डॉलर (करीब 430 रुपये) का विदेशी कर्ज है।




मोदी सरकार के दौरान कर्ज कितना बढ़ा?

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2022-23 के अंत तक भारत पर कुल कर्ज 152.61 लाख करोड़ रुपये था। इसमें आंतरिक कर्ज 148 लाख करोड़ रुपये और विदेशी कर्ज 5 लाख करोड़ रुपये शामिल था। यदि अतिरिक्त बजटीय संसाधन (ईबीआर) और नकद शेष को जोड़ा जाए तो कुल अनुमानित कर्ज 155.77 लाख करोड़ रुपये हो जाता है।

2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने कई बड़े आर्थिक फैसले लिए, जिनमें जीएसटी, नोटबंदी और मेक इन इंडिया जैसी योजनाएं शामिल थीं। लेकिन बढ़ते कर्ज और राजकोषीय घाटे के बीच सरकार को लगातार कर्ज लेना पड़ा।




मनमोहन सिंह सरकार में भारत पर कितना कर्ज था?

वर्ष 2014 तक ‘भारत सरकार की ऋण स्थिति’ पर जारी बजट दस्तावेजों के अनुसार, 31 मार्च 2014 तक भारत पर कुल कर्ज 55.87 लाख करोड़ रुपये था। इसमें आंतरिक कर्ज 54.04 लाख करोड़ रुपये और विदेशी कर्ज 1.82 लाख करोड़ रुपये था।

यूपीए सरकार के कार्यकाल में भारत ने 10 वर्षों में लगभग 33 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लिया, जो 190% की वृद्धि दर्शाता है।

कर्ज में किसके कार्यकाल में हुई सबसे ज्यादा बढ़ोतरी?

मनमोहन सिंह सरकार (2004-2014) के दौरान भारत का कर्ज 17 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 50 लाख करोड़ रुपये हो गया। इस दौरान कुल कर्ज में 190% की बढ़ोतरी हुई।

मोदी सरकार (2014-2023) के दौरान भारत का कर्ज 55 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 161 लाख करोड़ रुपये हो गया। यानी मोदी सरकार के कार्यकाल में कर्ज में 220% की बढ़ोतरी हुई।

मनमोहन सरकार में कर्ज की वृद्धि दर सालाना 19% रही, जबकि मोदी सरकार में यह 24% सालाना रही। इससे साफ है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत का कर्ज ज्यादा तेजी से बढ़ा है।



भारत पर बढ़ते कर्ज के कारण

भारत में कर्ज बढ़ने के पीछे कई वजहें हैं।

सरकारी खर्च में बढ़ोतरी के कारण कल्याणकारी योजनाओं, इन्फ्रास्ट्रक्चर, रक्षा बजट और सब्सिडी में भारी खर्च हुआ। कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार को आर्थिक राहत पैकेज और वैक्सीन प्रोग्राम पर बड़े खर्च करने पड़े। इसके अलावा, नोटबंदी, जीएसटी और वैश्विक मंदी के कारण सरकारी राजस्व प्रभावित हुआ।

बढ़ती ब्याज दरों के चलते भारत को अपने कर्ज का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च करना पड़ा। इसी कारण, बजट का लगभग 20% हिस्सा सिर्फ ब्याज चुकाने में जाता है।




निष्कर्ष – कौन जिम्मेदार?

आंकड़ों के आधार पर स्पष्ट है कि मोदी सरकार के दौरान भारत का कर्ज अधिक तेजी से बढ़ा है।

हालांकि, दोनों सरकारों की आर्थिक नीतियां और वैश्विक परिस्थितियां अलग-अलग थीं। मनमोहन सिंह सरकार के दौरान 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी का प्रभाव पड़ा था, वहीं मोदी सरकार ने कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी और यूक्रेन-रूस युद्ध जैसी आर्थिक चुनौतियों का सामना किया।

अब सवाल यह है कि क्या भारत इस बढ़ते कर्ज को संभाल पाएगा? क्या यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है?


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Imran Siddiqui

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