मोहब्बत, अमन और इंसानियत का पैगाम है बकरीद
जालना | NewsNation Online
ईद-उल-अज़हा कुर्बानी गाइडलाइन: ईद-उल-अज़हा यानी बकरीद का त्योहार नजदीक आते ही पूरे शहर में खुशी और उत्साह का माहौल दिखाई देने लगा है। बाजारों में रौनक बढ़ गई है, लोग खरीदारी में जुट गए हैं और मस्जिदों में भी ईद की तैयारियों को लेकर चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। इसी बीच जालना शहर की गुलजार मस्जिद के पेशइमाम मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही ने मुस्लिम समाज से अपील करते हुए कहा है कि ईद-उल-अज़हा का त्योहार शरीअत, इंसानियत और देश के कानून के दायरे में रहकर मनाया जाए।
शुक्रवार दोपहर जुमा की नमाज से पहले मस्जिद में मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए मौलाना मिस्बाही ने कहा कि बकरीद केवल जानवर की कुर्बानी का नाम नहीं है, बल्कि यह त्योहार त्याग, सब्र, इंसानियत और अल्लाह की राह में अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि इस त्योहार का असली मकसद समाज में मोहब्बत, भाईचारा और इंसानियत को मजबूत करना है।
उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि अगर हमारे किसी काम, व्यवहार या सोशल मीडिया पोस्ट से किसी दूसरे इंसान की भावनाएं आहत होती हैं, तो हमें उस काम से बचना चाहिए। त्योहार का असली मकसद लोगों के दिलों को जोड़ना है, न कि समाज में विवाद या तनाव पैदा करना।
सोशल मीडिया पर फोटो और वीडियो डालने से बचें
मौलाना मिस्बाही ने खास तौर पर युवाओं को नसीहत देते हुए कहा कि आज के दौर में सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ा है। कई बार लोग बिना सोचे-समझे कुर्बानी की फोटो और वीडियो फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और अन्य प्लेटफॉर्म पर शेयर कर देते हैं, जिससे विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है।
उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी बातें भी सोशल मीडिया पर बड़ा रूप ले लेती हैं और इससे समाज में गलत संदेश जाता है। इसलिए हर व्यक्ति को जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस्लाम हमेशा अमन, भाईचारे और दूसरों की भावनाओं के सम्मान का संदेश देता है।
कानून के दायरे में रहकर करें कुर्बानी
मौलाना मिस्बाही ने कहा कि कुर्बानी केवल उन्हीं जानवरों की की जाए जिनकी अनुमति भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार द्वारा दी गई है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस्लाम कभी भी कानून तोड़ने की इजाजत नहीं देता।
उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज को चाहिए कि प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन करे और ऐसी किसी भी गतिविधि से दूर रहे जिससे कानून व्यवस्था प्रभावित हो। उन्होंने लोगों से अपील की कि कुर्बानी ऐसी जगह करें जहां आम लोगों को परेशानी न हो और सार्वजनिक स्थानों की साफ-सफाई का भी पूरा ध्यान रखा जाए।
भारत सरकार और राज्य सरकार समय-समय पर पशु संरक्षण और कुर्बानी को लेकर दिशा-निर्देश जारी करती हैं। संबंधित नियमों और जानकारी के लिए लोग भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट Government of India और Maharashtra Government पर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
साफ-सफाई और जिम्मेदारी का रखें ध्यान
मौलाना मिस्बाही ने कहा कि ईद-उल-अज़हा के दौरान साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना भी हर नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि कुर्बानी के बाद पशुओं के अवशेष खुले में न फेंके जाएं और नगर परिषद या प्रशासन द्वारा तय व्यवस्था का पालन किया जाए।
उन्होंने कहा कि इस्लाम सफाई को आधा ईमान मानता है। इसलिए त्योहार के दौरान ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिए जिससे आसपास गंदगी फैले या लोगों को परेशानी हो। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे सोशल मीडिया पर बहस और विवाद से बचें और समाज में सकारात्मक संदेश फैलाएं।
गरीबों और जरूरतमंदों को भी करें शामिल
मौलाना मिस्बाही ने कहा कि बकरीद की असली खुशी तभी पूरी होती है जब गरीब, जरूरतमंद और बेसहारा लोगों तक भी खुशियां पहुंचें। उन्होंने लोगों से अपील की कि कुर्बानी के गोश्त में गरीबों का हिस्सा जरूर रखें और अपने आसपास रहने वाले जरूरतमंद परिवारों का ख्याल रखें।
उन्होंने कहा कि आज समाज में कई ऐसे लोग हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। ऐसे में अगर हम अपनी खुशियों में उन्हें शामिल करेंगे, तो यही ईद का असली संदेश होगा। उन्होंने कहा कि इंसानियत और मोहब्बत ही इस्लाम की सबसे बड़ी पहचान है।
भाईचारे और मोहब्बत का दें संदेश
अपने संबोधन के आखिर में मौलाना मिस्बाही ने कहा कि आज देश को सबसे ज्यादा जरूरत भाईचारे, अमन और आपसी सम्मान की है। उन्होंने कहा कि अगर सभी लोग एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए मिल-जुलकर त्योहार मनाएंगे, तो समाज में सकारात्मक माहौल बनेगा और ईद-उल-अज़हा का असली पैगाम लोगों तक पहुंचेगा।
उन्होंने कहा कि हमें अपने व्यवहार से यह दिखाना चाहिए कि इस्लाम शांति, मोहब्बत और इंसानियत का धर्म है। त्योहार का उद्देश्य लोगों के बीच दूरी बढ़ाना नहीं, बल्कि दिलों को करीब लाना होना चाहिए।
ईद-उल-अज़हा से जुड़ी इस्लामी जानकारी और त्योहार के महत्व के बारे में लोग Wikipedia – Eid al-Adha पर भी विस्तार से पढ़ सकते हैं।
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- ईद-उल-अज़हा का सामाजिक और धार्मिक महत्व: बकरीद केवल जानवर की कुर्बानी का त्योहार नहीं है, बल्कि यह त्याग, सब्र, मोहब्बत और इंसानियत का संदेश देता है।
- मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही का समाज से अपील: मौलाना ने कहा कि त्योहार शरियत, इंसानियत और कानून के दायरे में मनाया जाना चाहिए, और सोशल मीडिया पर विवाद से बचना चाहिए।
- साफ-सफाई और समुदायिक जिम्मेदारी: ईद के दौरान साफ-सफाई का ध्यान रखना और पशु अवशेष न फेंकने का निर्देश दिया गया है। साथ ही, जरूरतमंदों को भी त्योहार की खुशियां पहुंचानी चाहिए।
ईद-उल-अज़हा के दौरान साफ-सफाई का क्या महत्व है?
ईद-उल-अज़हा के दौरान साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखना जरूरी है क्योंकि यह इस्लाम में आधा ईमान माना गया है, और इससे आसपास गंदगी फैलने से रोका जा सकता है, और समाज में स्वच्छता का संदेश जा सकता है।
सोशल मीडिया पर कुर्बानी की फोटो और वीडियो साझा करने से किन समस्याओं का सामना हो सकता है?
सोशल मीडिया पर कुर्बानी की फोटो और वीडियो बिना सोचे-समझे साझा करने से विवाद और गलत संदेश फैल सकते हैं, जो समाज में गलतफहमी और तनाव की स्थिति पैदा कर सकते हैं।
मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही ने समाज से क्या अपील की है?
मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही ने समाज से अपील की है कि ईद-उल-अज़हा का त्योहार शरीअत, इंसानियत और कानून के दायरे में मनाया जाए, सोशल मीडिया पर विवाद से बचें और जिम्मेदारी से व्यवहार करें।
क्या बकरीद का त्योहार सिर्फ जानवर की कुर्बानी का नाम है?
नहीं, बकरीद का त्योहार सिर्फ जानवर की कुर्बानी का नाम नहीं है, बल्कि यह त्याग, सब्र, इंसानियत और अल्लाह की राह में अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का संदेश देता है।

