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जाह्नवी कपूर के व्यक्तित्व अधिकार मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा कदम, गौतम भाटिया बने अमिकस क्यूरी; 552 URL हटाने का आदेश

जाह्नवी कपूर के व्यक्तित्व अधिकार मामले में दिल्ली हाईकोर्ट और 552 URL हटाने का आदेश

नई दिल्ली: बॉलीवुड अभिनेत्री जाह्नवी कपूर के व्यक्तित्व अधिकारों से जुड़े मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अदालत ने अधिवक्ता गौतम भाटिया को अमिकस क्यूरी यानी न्याय मित्र नियुक्त किया है। वह अदालत को इस मामले से जुड़े व्यापक कानूनी सवालों पर स्वतंत्र कानूनी सहायता देंगे।

यह मामला इंटरनेट पर जाह्नवी कपूर के नाम, तस्वीर, पहचान और व्यक्तित्व के कथित अनधिकृत इस्तेमाल से जुड़ा है। अदालत अब यह भी देख रही है कि किसी कलाकार के व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों की सुरक्षा तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यंग्य और मानहानि जैसे पहलुओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

गौतम भाटिया को क्यों बनाया गया अमिकस क्यूरी?

न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने 3 सितंबर 2026 को जाह्नवी कपूर के मामले में अधिवक्ता गौतम भाटिया को अमिकस क्यूरी नियुक्त किया। अमिकस क्यूरी का अर्थ है ऐसा स्वतंत्र कानूनी विशेषज्ञ जो किसी मामले में अदालत की सहायता करता है।

अदालत के सामने सवाल केवल विवादित ऑनलाइन सामग्री हटाने तक सीमित नहीं है। अदालत यह भी तय करना चाहती है कि डिजिटल दौर में किसी सार्वजनिक व्यक्ति के नाम, तस्वीर, पहचान और समानता के इस्तेमाल पर व्यक्तित्व अधिकारों की कानूनी सीमा क्या होनी चाहिए।

6,884 URL का क्या है मामला?

जाह्नवी कपूर ने दिल्ली हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में इंटरनेट पर मौजूद हजारों वेबपेज, सोशल मीडिया पोस्ट और अन्य डिजिटल सामग्री पर आपत्ति जताई थी। मामले में करीब 6,884 URL सामने आए थे। याचिका में कथित तौर पर अश्लील सामग्री, पहचान की नकल, फर्जी पहचान और जाह्नवी कपूर के नाम तथा छवि के व्यावसायिक इस्तेमाल से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं।

हालांकि, अदालत ने सभी 6,884 URL को एक साथ हटाने का व्यापक आदेश देने से इनकार किया। अदालत का मानना था कि अलग-अलग प्रकृति की सामग्री को एक ही आदेश के तहत हटाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल खड़े कर सकता है।

552 URL हटाने का आदेश

इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने 552 URL हटाने का निर्देश दिया था। अदालत ने प्रथम दृष्टया पाया कि इन लिंक पर बेहद अश्लील या यौन रूप से आपत्तिजनक सामग्री मौजूद थी और इसके लिए जाह्नवी कपूर की अनुमति होने का कोई आधार सामने नहीं आया था। अदालत ने इस हिस्से में उनके पक्ष में प्रथम दृष्टया मामला और अंतरिम संरक्षण की जरूरत मानी।

बाकी URL को तीन श्रेणियों में बांटा गया

  • पहली नजर में अश्लील या यौन रूप से आपत्तिजनक सामग्री।
  • ऐसी सामग्री जो सीधे तौर पर जाह्नवी कपूर के व्यक्तित्व अधिकारों से कमाई करती है।
  • ऐसी सामग्री जिसमें उनके नाम या छवि का इस्तेमाल सामान और सेवाओं की बिक्री को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने के लिए किया जाता है।

अदालत के निर्देश के अनुसार विवादित URL को इन श्रेणियों में बांटा गया है, ताकि हर तरह की सामग्री पर उसके स्वरूप और इस्तेमाल के आधार पर अलग-अलग विचार किया जा सके।

मामला सिर्फ जाह्नवी कपूर तक सीमित नहीं

इस मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि डिजिटल दौर में कलाकारों और अन्य सार्वजनिक हस्तियों के नाम, तस्वीर, आवाज और पहचान के इस्तेमाल को लेकर लगातार कानूनी विवाद सामने आ रहे हैं। अदालत को यह भी देखना है कि व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा करते समय वैध आलोचना, व्यंग्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक रोक न लगे।

जाह्नवी कपूर के मामले के साथ अभिनेता विवेक ओबेरॉय से जुड़े व्यक्तित्व अधिकार मामले में भी अदालत ने स्वतंत्र कानूनी सहायता के लिए अमिकस क्यूरी नियुक्त किया है। यह संकेत देता है कि अदालत इन मामलों में व्यापक कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट करना चाहती है।

22 सितंबर को अगली सुनवाई

हालिया सुनवाई में जाह्नवी कपूर की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि विवादित URL को पहले के निर्देश के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में बांट दिया गया है। उनकी ओर से अंतरिम राहत की मांग पर जल्द सुनवाई का अनुरोध किया गया।

मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को निर्धारित है। अदालत उस दौरान अंतरिम राहत की मांग और व्यक्तित्व अधिकारों से जुड़े आगे के कानूनी पहलुओं पर विचार कर सकती है।

क्या हैं व्यक्तित्व अधिकार?

व्यक्तित्व अधिकारों का संबंध किसी व्यक्ति की पहचान, नाम, तस्वीर, आवाज, समानता और सार्वजनिक छवि के अनधिकृत इस्तेमाल से है। खासकर मशहूर हस्तियों के मामले में इन अधिकारों का व्यावसायिक इस्तेमाल, फर्जी पहचान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार सामग्री जैसे मुद्दे तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं।

डिस्क्लेमर: यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है। खबर में बताए गए आरोप और दावे संबंधित पक्षों की ओर से रखे गए हैं। इन्हें अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।

स्रोत


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Imran Siddiqui

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