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उपमुख्यमंत्री पद की वैधता पर न्यायिक बहस, महाराष्ट्र की सियासत पर भी पड़ सकता है असर

Hindi poster showing a smiling man in a suit beside a gavel and the Supreme Court building; bold headline discusses judicial validity and potential impact on Maharashtra politics, with bullet points and a lawyer’s name banner.

मुंबई: राज्यों में उपमुख्यमंत्री पद की संवैधानिक वैधता को लेकर चल रही न्यायिक बहस ने एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों का ध्यान आकर्षित किया है। ओडिशा हाईकोर्ट में दो उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस मामले में आने वाला निर्णय महाराष्ट्र की राजनीतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

संविधान में स्वतंत्र पद की स्पष्ट व्यवस्था नहीं

बताया जा रहा है कि ‘इलीना दाश बनाम ओडिशा राज्य’ (रिट याचिका क्रमांक 19554/2026) में याचिकाकर्ता की ओर से संविधान के अनुच्छेद 163 और 164 का हवाला देते हुए तर्क दिया गया है कि संविधान में ‘उपमुख्यमंत्री’ नाम से किसी स्वतंत्र संवैधानिक पद का उल्लेख नहीं है। ऐसे में इस पद की नियुक्ति और उससे जुड़ी सुविधाओं एवं अधिकारों को लेकर संवैधानिक सवाल उठते हैं।

हालांकि, इस विवाद को समझने के लिए पहले विभिन्न अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों और उपमुख्यमंत्री पद की वास्तविक संवैधानिक स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही दे चुका है अहम फैसला

उपमुख्यमंत्री पद की संवैधानिक स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। अदालत ने स्पष्ट किया था कि उपमुख्यमंत्री मूल रूप से मंत्रिपरिषद का ही सदस्य होता है। केवल ‘उपमुख्यमंत्री’ की पदवी दिए जाने से उसे संविधान में अलग से निर्धारित कोई स्वतंत्र संवैधानिक पद प्राप्त नहीं हो जाता।

सुप्रीम कोर्ट की इस भूमिका का अर्थ यह है कि संविधान में उपमुख्यमंत्री के लिए अलग प्रावधान नहीं होने के बावजूद केवल इसी आधार पर किसी उपमुख्यमंत्री की नियुक्ति को स्वतः असंवैधानिक नहीं माना जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला भी महत्वपूर्ण

इसी मुद्दे से जुड़े एक मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने भी 2024 में उपमुख्यमंत्री पद को लेकर दायर याचिका खारिज कर दी थी। अदालत के समक्ष राजस्थान के तत्कालीन उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा था कि उपमुख्यमंत्री मूल रूप से एक मंत्री ही होता है। ‘उपमुख्यमंत्री’ की पदवी अपने आप में उसे मुख्यमंत्री के समान या उससे स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार प्रदान नहीं करती।

महाराष्ट्र में क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

इस मामले का महाराष्ट्र की राजनीति से सीधा संबंध इसलिए बनता है क्योंकि राज्य में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार में एकनाथ शिंदे और सुनेत्रा अजित पवार उपमुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

ऐसे में ओडिशा हाईकोर्ट के फैसले पर महाराष्ट्र की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की भी नजर है। हालांकि, केवल ओडिशा हाईकोर्ट में मामला लंबित होने के आधार पर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री पद को असंवैधानिक मानना उचित नहीं होगा।

मौजूदा न्यायिक स्थिति के अनुसार उपमुख्यमंत्री मूल रूप से मंत्रिपरिषद का सदस्य होता है। उसे ‘उपमुख्यमंत्री’ की पदवी दिए जाने से मुख्यमंत्री के समान स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं होते।

अतिरिक्त सुविधाओं और प्रोटोकॉल का सवाल

कानूनी विशेषज्ञ एडवोकेट महेश धन्नावत के अनुसार, संविधान में उपमुख्यमंत्री पद का अलग से उल्लेख नहीं है, लेकिन विभिन्न न्यायिक फैसलों के आधार पर उपमुख्यमंत्री को मूल रूप से मंत्री के रूप में ही देखा जाता है।

उनका कहना है कि वास्तविक सवाल इस बात पर भी है कि उपमुख्यमंत्री को मिलने वाले अतिरिक्त भत्ते, विशेष सुविधाएं, सरकारी प्रोटोकॉल और प्रशासनिक अधिकार किस कानूनी आधार पर निर्धारित किए जाते हैं। ऐसे मामलों में संविधान, संबंधित कानूनों और सरकारी नियमों का पूरे राज्य में समान और स्पष्ट तरीके से पालन होना आवश्यक है।

महाराष्ट्र के पुराने मामले भी चर्चा में

महाराष्ट्र में भी उपमुख्यमंत्री पद की संवैधानिक स्थिति को लेकर पहले न्यायिक स्तर पर सवाल उठ चुके हैं। देवीदास बनाम गोपीनाथ मुंडे मामले का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया जाता रहा है।

इस पृष्ठभूमि में ओडिशा हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद उपमुख्यमंत्री पद की संवैधानिक स्थिति पर एक बार फिर व्यापक कानूनी बहस शुरू हो सकती है।

क्या महाराष्ट्र सरकार पर पड़ेगा सीधा असर?

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ओडिशा हाईकोर्ट का फैसला सीधे तौर पर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्रियों के पद को प्रभावित करेगा। इसका कारण यह है कि उपमुख्यमंत्री पद से संबंधित महत्वपूर्ण न्यायिक व्याख्याएं पहले ही सामने आ चुकी हैं।

यदि ओडिशा हाईकोर्ट अपने फैसले में पहले से स्थापित न्यायिक सिद्धांतों से अलग कोई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है, तो मामला आगे उच्चतर न्यायिक मंच तक जा सकता है। ऐसी स्थिति में देश के अन्य राज्यों में उपमुख्यमंत्री पद की संवैधानिक स्थिति पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

अब फैसले का इंतजार

उपमुख्यमंत्री पद का मुद्दा केवल राजनीतिक पदवी तक सीमित नहीं है। इसके साथ मंत्रिपरिषद की संरचना, विभागों के बंटवारे, प्रशासनिक अधिकार, सरकारी प्रोटोकॉल और सार्वजनिक धन से मिलने वाली सुविधाओं जैसे कई सवाल जुड़े हैं।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायिक व्याख्याओं के अनुसार उपमुख्यमंत्री मूल रूप से एक मंत्री होता है और केवल ‘उपमुख्यमंत्री’ की पदवी अपने आप में असंवैधानिक नहीं मानी गई है।

अब ओडिशा हाईकोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार है। अदालत का निर्णय यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि उपमुख्यमंत्री पद से जुड़े संवैधानिक और प्रशासनिक पहलुओं की व्याख्या किस दिशा में आगे बढ़ती है। इसी कारण महाराष्ट्र समेत देश के कई राज्यों की राजनीतिक और कानूनी निगाहें इस मामले पर टिकी हुई हैं।

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Advocate Mahesh Dhannawat

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