मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित फिल्म सतलुज को लेकर पंजाब की राजनीति लगातार गर्माती जा रही है। अब सुखबीर सिंह बादल ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी शिरोमणि अकाली दल इस फिल्म को पंजाब के हर गांव और कोने में लोगों को दिखाएगी। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को पंजाब के उस दौर के बारे में जानकारी मिलनी चाहिए, जिसे वह राज्य के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय मानते हैं।
OTT से हटने के बाद बढ़ा विवाद
यह फिल्म पहले “Punjab ’95” के नाम से बनाई गई थी, लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर ‘सतलुज’ कर दिया गया। फिल्म को 3 जुलाई को ZEE5 पर रिलीज किया गया था, लेकिन दो दिन बाद 5 जुलाई को प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया। इसके बाद विवाद और तेज हो गया। हालांकि, फिल्म हटाए जाने के बावजूद पंजाब के कुछ इलाकों में सिख धार्मिक संगठनों और स्थानीय समूहों ने गुरुद्वारों और गांवों में इसका सार्वजनिक प्रदर्शन शुरू कर दिया।
सुखबीर सिंह बादल ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा कि यह फिल्म कांग्रेस शासन के दौरान कथित अत्याचारों और जसवंत सिंह खालरा के संघर्ष को सामने लाती है। उन्होंने दावा किया कि नई पीढ़ी को इतिहास से परिचित कराना जरूरी है और उनकी पार्टी इस उद्देश्य से पूरे पंजाब में फिल्म का प्रदर्शन करेगी।
फिल्म हटाने पर राजनीतिक बयानबाजी तेज
फिल्म को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने उन आरोपों को खारिज किया कि फिल्म को OTT प्लेटफॉर्म से हटाने में केंद्र सरकार या भाजपा की कोई भूमिका है। उन्होंने कहा कि फिल्म जिन घटनाओं को दिखाती है, उस समय पंजाब और केंद्र दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी, इसलिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराना तथ्यों के अनुरूप नहीं है।
इस बीच पंजाब भाजपा ने जानकारी दी कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म को OTT से हटाने के मामले की समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय रिव्यू कमेटी गठित की है। पार्टी का कहना है कि यह कदम राज्य इकाई की मांग के बाद उठाया गया।
जसवंत सिंह खालरा की कहानी पर आधारित है फिल्म
फिल्म का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है। यह मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है। खालरा ने 1984 से 1994 के बीच पंजाब में अज्ञात शवों के कथित अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों की जांच की थी। वर्ष 1995 में वह लापता हो गए थे। बाद में इस मामले में पंजाब पुलिस के कुछ कर्मियों को अपहरण और हत्या का दोषी ठहराया गया था।
फिल्म को लेकर अब बहस केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गई है। एक पक्ष इसे इतिहास और मानवाधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसके प्रस्तुतीकरण और ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर सवाल उठा रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह विवाद और राजनीतिक रूप ले सकता है।
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