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“रुपया ICU में, बाजार की नब्ज धीमी: मध्यम वर्ग की चीख को कौन सुनेगा?”

“Rupee in ICU, market pulse slow: Who will listen to the cries of the middle class?”.

भारत में रुपये की ऐतिहासिक गिरावट और डूबते बाजारों के बीच मध्यम वर्ग हाशिए पर है। रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर (86 प्रति डॉलर) पर पहुंच गया है, और बाजार अपनी चमक खोते जा रहे हैं।

याद करें 2013 का दौर, जब रुपये की गिरावट पर गुस्सा उबाल पर था। नरेंद्र मोदी, तब गुजरात के मुख्यमंत्री, ने इसे “रुपये का ICU में होना” बताया था और विदेशी शक्तियों के भारत पर हावी होने का अंदेशा जताया था। फिल्मी सितारे भी अपनी चुटीली टिप्पणियों से सरकार को आड़े हाथ ले रहे थे।

लेकिन आज? वही हालात और वही समस्याएं—फिर भी न कोई हंगामा, न कोई तीखी प्रतिक्रिया।

रुपये की गिरावट पर चुप्पी क्यों?

2013 में मीडिया, सेलेब्रिटीज और विपक्ष ने इसे राष्ट्रीय संकट बताया। आज, वही लोग खामोश हैं। क्या यह डर है या सत्ता के प्रति झुकाव?

मध्यम वर्ग: हाशिये पर

मध्यम वर्ग, जो करदाता भी है और निवेशक भी, रुपये की गिरावट और बाजार की अनिश्चितता का सबसे बड़ा भुक्तभोगी है। उनके करों का बोझ लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उनकी चिंताओं पर कोई चर्चा नहीं होती।

बाजार की बर्बादी और रुपये की बेबसी

शेयर बाजार की अस्थिरता और रुपये की गिरती ताकत विदेशी निवेशकों के मोहभंग और आर्थिक नीतियों की विफलता की ओर इशारा करती हैं। इसके बावजूद, सरकार से न कोई जवाबदेही मांगी जा रही है और न ही भविष्य की कोई ठोस रणनीति पेश की जा रही है।

दोहरे मापदंड और असहाय जनता

क्या यह समय नहीं कि राजनेता अपनी पुरानी बयानबाजी पर फिर से विचार करें? क्या मध्यम वर्ग को अपनी आवाज उठाने के लिए हर बार अपनी जेब खाली करनी होगी?

देश रुपये की गिरावट से जूझ रहा है, लेकिन ऐसा लगता है कि इस बार बाजार के शोर में मध्यम वर्ग की चीखें कहीं दब गई हैं।


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Imran Siddiqui

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