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पिता कर्ज में डूबे, दो वक्त के भोजन के लिए संघर्ष, फिर भी IAS अधिकारी बने तुकाराम मुंढे की प्रेरणादायक कहानी

पिता कर्ज में डूबे, दो वक्त के भोजन के लिए संघर्ष, फिर भी IAS बनने का संकल्प पूरा किया — तुकाराम मुंढे की प्रेरणादायक कहानी

पिता कर्ज में डूबे, दो वक्त के भोजन के लिए संघर्ष, फिर भी IAS बनने का संकल्प पूरा किया — तुकाराम मुंढे की प्रेरणादायक कहानी

महाराष्ट्र के बीड़ जिले के ताडसोंना गांव से निकलकर आज राज्य के चर्चित और निर्भीक आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे ने अपने जीवन में अपार संघर्षों को पार कर अपनी मेहनत से इतिहास रचा है। 3 जून 1975 को जन्मे तुकाराम के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। उनके पिता हरिभाऊ मुंढे भारी कर्ज के बोझ तले दबे हुए थे और परिवार को दो वक्त का भोजन जुटाना भी मुश्किल हो जाता था।

बचपन में संघर्ष — दो वक्त का भोजन भी मुश्किल

तुकाराम का बचपन गरीबी और कठिनाइयों से घिरा था। छोटे तुकाराम ने कभी भी अपने परिवार की परिस्थिति को अपने सपनों के बीच आने नहीं दिया। वे सुबह से शाम तक खेतों में काम करते, कभी-कभी परिवार के लिए सप्ताह के बाजार में जाकर सब्जी भी बेचते थे। यह सब उनकी जिम्मेदारी थी ताकि घर का गुजारा हो सके। उनकी जिंदगी का हर दिन एक नई चुनौती लेकर आता था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

शिक्षा और प्रारंभिक चुनौतियां

अपने गांव के ही स्कूल से तुकाराम ने दसवीं कक्षा पूरी की। पढ़ाई के साथ-साथ परिवार की मदद करना उनकी प्राथमिकता थी। लेकिन उनका सपना बड़ा था — वह IAS अधिकारी बनना चाहते थे। UPSC की परीक्षा पास करना उनके लिए कोई आसान काम नहीं था।

उन्होंने पहली बार UPSC की परीक्षा दी लेकिन मेन्स परीक्षा में असफल हो गए। हार नहीं मानी और दूसरी बार फिर से प्रयास किया, इस बार भी प्रिलिम्स और मेन्स तो पास हुए लेकिन अंतिम इंटरव्यू में असफल रहे। तीसरे प्रयास में भी सफलता नहीं मिली। यह तीन बार की असफलता उनके लिए भारी थी, लेकिन उन्होंने धैर्य और संकल्प के साथ हार नहीं मानी।

एमपीएससी में सफलता और फिर UPSC की सफलता

उनके प्रयासों को सफलता 2003 में मिली, जब उन्होंने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की क्लास 2 की परीक्षा पास की और अधिकारी के रूप में चयनित हुए। यह उनका पहला बड़ा कदम था जो उन्हें अपने सपने के करीब ले गया।

लेकिन उनका लक्ष्य केवल यही नहीं था। उन्होंने 2004 में पुनः UPSC की परीक्षा दी और इस बार 20वीं रैंक हासिल की। इस सफलता ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया।

कार्यक्षेत्र में अनुशासन और समर्पण

तुकाराम मुंढे की कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन, और निर्भीकता के लिए वे महाराष्ट्र के जाने-माने अधिकारियों में गिने जाते हैं। उनकी कड़ी मेहनत और न्यायप्रियता की वजह से वे हमेशा चर्चा में रहते हैं।

बार-बार बदली के बावजूद अडिग

अपने कार्यकाल में उन्होंने अब तक 24 बार पदस्थापन का सामना किया है। लगातार बदलाव और चुनौतियां उनके लिए नए अवसर लेकर आईं। वे हर परिस्थिति में अपने कर्तव्यों का निर्वहन निष्ठा और समर्पण के साथ करते रहे।

वर्तमान पद और भविष्य की जिम्मेदारियां

हाल ही में तुकाराम मुंढे को मुंबई में दिव्यांग कल्याण विभाग के सचिव के पद पर नियुक्त किया गया है। इस पद पर वे दिव्यांग व्यक्तियों के कल्याण के लिए नीतियों को मजबूत करने और उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने का काम करेंगे।

प्रेरणा स्रोत — असफलता से सफलता तक का सफर

तुकाराम मुंढे की कहानी यह संदेश देती है कि असफलताएं अंत नहीं होतीं, बल्कि वे सफलता की राह में पड़ाव होते हैं। गरीबी, असफलता, और कठिनाइयों के बावजूद यदि मन में दृढ़ निश्चय हो तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।

उनका जीवन संघर्ष और मेहनत की मिसाल है, जो सभी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

Main Points in English:

  • Tukaram Mundhe is an IAS officer from Beed district, Maharashtra.
  • Born on 3 June 1975 in a financially weak family with heavy debts.
  • Struggled for two meals a day during childhood; helped family by working in fields and selling vegetables.
  • Failed UPSC exam three times but persisted with determination.
  • Cleared MPSC Class 2 exam in 2003 and later cracked UPSC in 2004 with 20th rank.
  • Known for discipline, dedication, and fearlessness.
  • Has undergone 24 transfers so far in his career.
  • Recently appointed Secretary of Disabled Welfare Department, Mumbai.
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