पेपर लीक विवाद के बाद आयोजित NEET UG 2026 री-एग्जाम को देश की सबसे सुरक्षित परीक्षाओं में से एक बनाने का दावा किया गया था। लेकिन परीक्षा के दिन सामने आई घटनाओं ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए कि क्या कोई भी परीक्षा प्रणाली पूरी तरह अभेद्य हो सकती है?
सख्ती के बावजूद नहीं थमी धोखाधड़ी
18 जून 2026 को आयोजित री-एग्जाम में NTA ने बायोमेट्रिक सत्यापन, AI आधारित निगरानी, CCTV कैमरे, जैमर और लाखों सुरक्षा कर्मियों की तैनाती जैसे बड़े इंतजाम किए थे। इसके बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों से नकल और फर्जीवाड़े के मामले सामने आए।
सबसे बड़ा मामला बिहार से आया, जहां पुलिस ने कथित सॉल्वर गैंग का भंडाफोड़ किया। जांच में सामने आया कि मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे कुछ छात्र पैसे लेकर अन्य अभ्यर्थियों की जगह परीक्षा देने पहुंचे थे।
बायोमेट्रिक सिस्टम में सेंध
जांच एजेंसियों के अनुसार, परीक्षा केंद्रों पर तैनात कुछ कर्मियों की मिलीभगत से फर्जी उम्मीदवारों को प्रवेश दिलाया गया। आरोप है कि लाखों रुपये लेकर असली अभ्यर्थियों की जगह सॉल्वर बैठाए गए। इस मामले में कई मेडिकल छात्रों समेत दर्जनों लोगों की गिरफ्तारी हुई है।
इस घटना ने परीक्षा सुरक्षा के सबसे मजबूत माने जाने वाले बायोमेट्रिक सिस्टम की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए।
हैदराबाद से जयपुर तक नए तरीके
हैदराबाद में एक अभ्यर्थी ने परीक्षा शुरू होने से पहले टॉयलेट में मोबाइल फोन छिपा दिया और बाद में उसका इस्तेमाल करने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया। वहीं जयपुर में एक छात्रा अंडरगारमेंट्स में मोबाइल छिपाकर परीक्षा केंद्र तक पहुंच गई। हालांकि वह परीक्षा समाप्त होने से पहले पकड़ ली गई।
इन घटनाओं ने दिखाया कि तकनीकी सुरक्षा के बावजूद मानवीय सतर्कता कितनी महत्वपूर्ण है।
AI के जरिए फर्जी पेपर का कारोबार
इंदौर में एक युवक ने ChatGPT और अन्य AI टूल्स की मदद से फर्जी प्रश्नपत्र तैयार कर उन्हें असली NEET पेपर बताकर सोशल मीडिया पर बेचना शुरू कर दिया। पुलिस कार्रवाई के बाद यह रैकेट उजागर हुआ।
यह मामला बताता है कि नई तकनीकें केवल सुरक्षा बढ़ाने के लिए ही नहीं, बल्कि धोखाधड़ी के नए तरीके विकसित करने के लिए भी इस्तेमाल की जा रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी
NEET 2026 री-एग्जाम ने साबित किया कि सुरक्षा व्यवस्था पहले की तुलना में मजबूत जरूर हुई है, लेकिन चुनौतियां भी उतनी ही जटिल हो गई हैं। असली लड़ाई केवल पेपर लीक रोकने की नहीं, बल्कि उन नेटवर्क और मानसिकता को खत्म करने की है जो हर बार सिस्टम को धोखा देने का नया रास्ता खोज लेते हैं। जब तक यह चुनौती बनी रहेगी, तब तक किसी भी परीक्षा को पूरी तरह सुरक्षित घोषित करना आसान नहीं होगा।
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