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गोसेवा आयोग के आदेश के बावजूद जालना में बकरा बाजार बंद — मुस्लिम समाज ने जताया विरोध, सौंपा ज्ञापन

बकरा बाजार बंद करने पर मुस्लिम समाज का विरोध | जालना

शुरु रखने के आदेश के बावजूद जालना में बकरा बाजार बंद

मुस्लिम समाज ने जताया कड़ा विरोध, जिलाधिकारी को सौंपा ज्ञापन

🗓️ 3 जून 2025 | 📍 जालना | ✍️ रिपोर्ट: न्यूज़ नेशन ऑनलाइन ब्यूरो

जालना में ईद-उल-अज़हा से पहले बकरा बाजार को लेकर एक बड़ा विवाद उत्पन्न हो गया है। मंगलवार, 3 जून 2025 को जालना कृषि उत्पन्न बाजार समिति में हर सप्ताह लगने वाला बकरा बाजार, प्रशासन और पुलिस के हस्तक्षेप से अचानक बंद करवा दिया गया।

यह तब हुआ जब महाराष्ट्र गोसेवा आयोग ने 2 जून को अपने संशोधित आदेश में स्पष्ट किया था कि गोवंश को छोड़कर अन्य जानवरों जैसे बकरा, मेंढा, भेड़ आदि के बाजार सामान्य रूप से चल सकते हैं।

इस अचानक बंदी से नाराज़ मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों ने जिलाधिकारी कार्यालय पहुँचकर तीव्र विरोध दर्ज कराया और एक ज्ञापन सौंपा।

क्या कहा गया ज्ञापन में?

  • बकरी ईद 7 जून को मनाई जानी है, जिसके लिए किसान और पशुपालक हफ्तों से तैयारी कर रहे थे।
  • जानवरों को अच्छे दाम में बेचने की उम्मीद थी, लेकिन बाजार बंद होने से उन्हें आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।
  • इस निर्णय को मुस्लिम समाज ने धार्मिक भावना पर आघात और भेदभावपूर्ण बताया।
  • ज्ञापन में 3 से 8 जून तक बकरा बाजार चलने की मांग की गई है।

ज्ञापन में उल्लेख किया गया कि 27 मई को आयोग ने जानवर बाजारों पर प्रतिबंध का आदेश दिया था, लेकिन 2 जून को इसे संशोधित करते हुए केवल गोवंश की खरीद-बिक्री पर रोक लगाई गई थी। इसके बावजूद, 3 जून को पुलिस की मौजूदगी में बकरा बाजार को जबरन बंद करवा दिया गया।

समुदाय की मांगें और सुझाव

ज्ञापन में यह मांग की गई है कि:

  1. 3 जून से 8 जून तक सभी बकरा बाजार सामान्य रूप से चलने दिए जाएं।
  2. प्रशासन कानून व्यवस्था बनाए रखते हुए सभी बाजारों को सहयोग प्रदान करे।
  3. भविष्य में कोई भी निर्णय लेते समय धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया जाए।

ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख नाम:

इस विरोध ज्ञापन पर जिन लोगों ने हस्ताक्षर किए, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

खान आमेर पाशा, फ़िरोज़ बागवान, अफसर चौधरी, नविद खान, असद रजवी, शाहेद खान, कामरान खान, फहाद चाऊस, अंकुश कांबले, आवेज़ खान, आमेर सिद्दीकी, आमीन शेख और अन्य नागरिक।

यह पूरा मामला प्रशासनिक निर्णय और धार्मिक संवेदनशीलता के टकराव का उदाहरण बन गया है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो सकती है।

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Imran Siddiqui

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