श्याम सारस्वत
भारतीय लोकतंत्र में चुनावों का उत्सव आता-जाता रहता है। सत्ताधारियों के चेहरे बदलते हैं, विपक्षी दलों के रुख बदलते हैं और भाषणों के शब्द बदलते हैं। कभी देश को ‘महासत्ता’ बनाने के दावे किए जाते हैं, तो कभी ‘विश्वगुरु’ बनाने का ढिंढोरा पीटकर जनता को सम्मोहन (भ्रम) में रखा जाता है। लेकिन इस चुनावी चमक-दमक के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि आजादी के दशक बीत जाने के बाद भी आम जनता आज भी तीन बुनियादी शब्दों के इर्द-गिर्द फंसी हुई है: ‘वॉटर’ (पानी), ‘गटर’ (स्वच्छता और ड्रेनेज) और ‘मीटर’ (बिजली, टैक्स और महंगाई)!
आज यह सवाल केवल प्रशासनिक विफलता का नहीं रह गया है, बल्कि एक बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा बन चुका है। ये तीन समस्याएं सुलझाने के लिए राजनेताओं के पास कभी इच्छाशक्ति नहीं रही, बल्कि इन्हें जानबूझकर उलझाए रखा गया है। क्योंकि, अगर ये समस्याएं सुलझ गईं, तो राजनेताओं की दुकानें बंद हो जाएंगी! आम जनता की इन्हीं बुनियादी जरूरतों को समस्या का रूप देकर राजनेता अपनी रोटियां सेकते हैं और अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करते हैं।
गली में नरक, दिल्ली में ‘विश्वगुरु’ का ढोल!
आज देश को जगद्गुरु और विश्वगुरु बनाने के दावे इतने जोर-शोर से किए जा रहे हैं कि उस शोर में आम आदमी की पानी के लिए चीख-पुकार दब जाती है। जो देश चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंच गया है, जो देश दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के सपने देख रहा है, उसी देश के नागरिकों को आज भी बूंद-बूंद पीने के पानी के लिए तड़पना पड़ता है? इस व्यवस्था पर शर्म आती है! जिस शहर की गलियों में गटर और ड्रेनेज लाइन ठीक से साफ नहीं की जा सकतीं, वह व्यवस्था देश को जगत श्रेष्ठ बनाने का सपना दिखाती है, यह केवल एक क्रूर मज़ाक है।
‘स्मार्ट सिटी’ और ‘अमृत योजना’ का सच
‘स्मार्ट सिटी’ और ‘अमृत योजना’ जैसी योजनाओं के नाम पर हजारों करोड़ रुपये मंजूर किए जाते हैं। बारिश के मौसम में जब सड़कें गटर बन जाती हैं और उसमें गिरकर जब कोई मासूम नागरिक मरता है, तब ये ‘विश्वगुरु’ का सपना दिखाने वाले नेता कहां होते हैं? पहले गंदी बस्तियों की समस्या सुलझाओ, नागरिकों को सम्मान से जीने दो, फिर अंतरिक्ष की बातें करो, क्या यह सीधा नियम नेताओं को समझ नहीं आता? क्योंकि, स्थानीय स्तर पर आम करदाताओं की जेब काटना और ठेकेदारों से कमीशन लेना ही इस व्यवस्था का असली मकसद बन चुका है।
‘समस्या’ जीवित रखना ही राजनेताओं का धंधा
क्या कभी आम जनता को ‘वॉटर, गटर और मीटर’ के इस चक्रव्यूह में फंसाकर रखने के पीछे की राजनीति पर विचार किया गया है? यह राजनीति का एक क्रूर और सोचा-समझा नियम है। जनता को हमेशा बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करते रहने दो, ताकि उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे बड़े मुद्दों पर सोचने का समय ही न मिले। विचार करने के लिए उनके पास दिमाग न बचे। नेताओं के बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं, उनकी पीढ़ियां करोड़ों-अरबों के साम्राज्य में खेलती हैं। लेकिन आम आदमी का बच्चा मात्र पानी के टैंकर का इंतजार करते हुए सड़कों पर बड़ा होता है। चुनाव आते ही पानी का टैंकर मुफ्त देकर या गटर साफ करने का temporary आश्वासन देकर ये नेता फिर से वोट पा लेते हैं। अगर पानी और ड्रेनेज की समस्या हमेशा के लिए खत्म हो गई, तो अगले चुनाव में वोट मांगने के लिए ये नेता जनता के सामने किस मुंह से जाएंगे? इसलिए, समस्या को जीवित रखना ही इन राजनेताओं की पीढ़ियों को पालने वाला सबसे सुरक्षित धंधा बन गया है।
‘मीटर’ का जाल और जनता की अंधी भक्ति
एक तरफ पानी का संकट और दूसरी तरफ गंदगी का साम्राज्य, इस सब के बीच आम जनता को महंगाई के इस दौर में बिजली और पानी के बिलों के बढ़ते हुए ‘मीटर’ का सामना करना पड़ रहा है। ईमानदारी से टैक्स भरने के बाद भी जनता को बदले में क्या मिलता है? उफनते हुए गटर, दूषित पानी और भ्रम पैदा करने वाले वादे! अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डंका बजाने की बातें करने वाले शासकों को स्थानीय स्तर पर आम आदमी का खून चूसने में ही मजा आता है।
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जब आम नागरिक इन समस्याओं से परेशान होकर सड़कों पर उतरता है, तब राजनेता कोई नया राष्ट्रवाद, जाति या धर्म का विवादित मुद्दा उछालकर उन्हें गुमराह कर देते हैं। जनता अपनी बुनियादी समस्याओं को भूलकर नेताओं की अंधी भक्ति में एक-दूसरे से लड़ने लगती है। यह आम जनता का शुद्ध पागलपन है, जिसका फायदा नेता उठाते हैं।
स्मार्ट मीटर का नया हथकंडा और जनता की नई लूट
आजकल जनता के घरों में जबरन ‘स्मार्ट मीटर’ लगाने की साजिश रची जा रही है। यह बिजली वितरण में सुधार लाने या पारदर्शिता लाने के नाम पर ग्राहकों पर थोपा जा रहा है। पहले से ही भारी-भरकम बिजली बिलों के कारण आम आदमी परेशान है, और अब ये नए मीटर जनता की जेब पर सीधा डाका डालने के लिए तैयार किए गए हैं। रिचार्ज खत्म होते ही बिजली गुल हो जाने की इस नई तकनीक ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। ये ‘स्मार्ट’ मीटर जनता की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को फायदा पहुंचाने और ठेकेदारों की जेब भरने के लिए लाए गए हैं, यह बात अब छिपी नहीं है। ‘विश्वगुरु’ बनने का ढोंग रचने वाली इस व्यवस्था में, डिजिटल होने के नाम पर महंगाई से बेहाल परिवारों को और अधिक आर्थिक संकट में धकेला जा रहा है।
सत्ता किसी की भी हो, राज केवल ‘वंशवाद’ का
इस पूरी व्यवस्था का सबसे कड़वा सच यह है कि सत्ता में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो या कोई भी विचारधारा हो, सत्ता के केंद्र में रहने वाले चेहरे हमेशा एक ही परिवार या वंश से होते हैं। यदि मुख्य नेता बदल भी जाए, तो उसकी कुर्सी पर उसका बेटा, दामाद, भतीजा या कोई करीबी रिश्तेदार ही आकर बैठता है। आज पार्टियां टूटती हैं, गठबंधन बदलते हैं और समीकरण बदलते हैं, लेकिन इस पूरी राजनीति में राजनेताओं का वंशवाद और उनका पारिवारिक हित हमेशा सुरक्षित रहता है। एक ही परिवार का कोई सदस्य एक पार्टी में होता है तो दूसरा किसी दूसरी पार्टी में रहकर अपनी विचारधारा का मुखौटा बदल लेता है, ताकि केवल जनता को आपस में लड़ाया जा सके। चुनाव जीतने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले हथकंडों के पीछे इन सभी नेताओं के वारिस एक समान होते हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य आम जनता की बुनियादी समस्याओं को दबाकर अपनी पारिवारिक और राजनीतिक जागीर को पीढ़ियों तक जीवित रखना होता है।
अब तो जाग जाओ! आत्मचिंतन का समय
वर्षों से केवल अलग-अलग नारों और सपनों के जाल में फंसाकर जनता को गुमराह किया गया है। स्थानीय स्तर पर ग्राम पंचायत, नगर पंचायत से लेकर मंत्रालयों तक आम जनता की कोई सुनवाई नहीं है। आलीशान गाड़ियों और वातानुकूलित (AC) बंगलों में रहने वाले नेताओं के पैर कभी जमीन पर नहीं पड़ते, क्योंकि उनकी पीढ़ियां सुरक्षित हैं।
अब समय आ गया है कि जनता इस दिशाहीन करने वाली राजनीति का शिकार होना बंद करे। जब तक हम पार्टी, जाति और नेताओं की अंधभक्ति को किनारे रखकर अपने जनप्रतिनिधियों कॊ पकड़कर सीधे सवाल नहीं पूछेंगे कि—हमारा पानी कहां है? गटर कब साफ होगा? और मीटर का अत्याचार कब थमेगा? तब तक हमें देश के नागरिक के रूप में न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं मिलेंगी। फिर भले ही ‘विश्वगुरु’ बनने की कितनी भी झूठी बातें की जाएं! तब तक ये राजनेताओं की पीढ़ियां हमारे सिर पर बैठकर राज करती रहेंगी। लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक होती है, यह बात इन राजनेताओं को अच्छी तरह से समझानी होगी, अन्यथा हमारी आने वाली पीढ़ियां भी इसी ‘वॉटर, गटर और मीटर’ के नर्क में तड़पती रहेंगी!

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