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कलकत्ता हाईकोर्ट का अहम फैसला: ‘वन-टाइम सेटलमेंट’ कर्जदार का अधिकार नहीं

कलकत्ता हाईकोर्ट का अहम फैसला: ‘वन-टाइम सेटलमेंट’ कर्जदार का अधिकार नहीं, बैंक की नीति का हिस्सा; ॲड. महेश धन्नावत का देशभर की बैंकों को संदेश


जालना। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाला निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि वन-टाइम सेटलमेंट (OTS) कर्जदार का कोई कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि यह पूरी तरह बैंक की व्यावसायिक नीति पर आधारित एक प्रक्रिया है। उच्च न्यायालय ने यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व निर्णयों के आधार पर दिया है, जिससे यह आदेश पूरे देश की बैंकों पर लागू माना जाएगा।

नोटरी एसोसिएशन के कार्यकारी अध्यक्ष ॲड. महेश एस. धन्नावत ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह फैसला बैंकों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वे OTS को कर्जदार का अधिकार समझने का भ्रम दूर करें और कर्जदारों पर अनावश्यक दबाव बनाना बंद करें।


न्यायालय ने क्या कहा? — निर्णय की प्रमुख बातें

न्यायमूर्ति अनिरुद्ध रॉय की एकलपीठ ने सेन्बो इंजीनियरिंग लिमिटेड बनाम बैंक ऑफ महाराष्ट्र मामले की सुनवाई करते हुए OTS से जुड़े कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टता दी।

न्यायालय ने कहा—

  • OTS योजना तभी कानूनी स्वरूप धारण कर सकती है जब वह किसी वैधानिक योजना या प्रावधान का हिस्सा हो।
  • OTS स्वीकार करने या न करने का निर्णय पूर्णतः बैंक की व्यावसायिक समझ व नीति पर आधारित होता है।
  • केवल प्रस्ताव, बातचीत या आंशिक भुगतान के आधार पर OTS को बाध्यकारी नहीं माना जा सकता।
  • अतः OTS लागू कराने के लिए न्यायालय में ‘विशिष्ट कार्यवाही’ (Specific Performance) का दावा स्वीकार्य नहीं है।

न्यायालय ने इस आधार पर कर्जदार द्वारा दायर दीवानी वाद को खारिज कर दिया।


प्रकरण की पृष्ठभूमि — कैसे शुरू हुआ विवाद?

सेन्बो इंजीनियरिंग लिमिटेड ने बैंक ऑफ महाराष्ट्र से लिया कर्ज निर्धारित समय पर नहीं चुकाया, जिसके चलते बैंक ने उनके खाते को एनपीए (अनुत्पादित संपत्ति) घोषित कर दिया।
इसके उपरांत बैंक ने—

  • SARFAESI Act, 2002 तथा
  • Insolvency and Bankruptcy Code (IBC), 2016)

के अंतर्गत वसूली की कार्रवाई प्रारंभ की।

इसी दौरान कंपनी ने बैंक से OTS के लिए बातचीत शुरू की और कुछ राशि जमा भी की। कंपनी का दावा था कि भुगतान स्वीकार होने से OTS समझौता पूर्ण हो चुका है।
इसी आधार पर कंपनी ने वसूली कार्यवाही पर रोक लगाने और OTS लागू करवाने के लिए अदालत का
रुख किया।

बैंक ने CPC के आदेश 7 नियम 11 के तहत दावा खारिज करने की मांग करते हुए कहा कि OTS किसी विधिक योजना का हिस्सा नहीं है, इसलिए उस पर कानूनी दावा नहीं बनता।
अदालत ने बैंक की आपत्ति स्वीकार
की।


सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख फैसलों का उल्लेख

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के तीन महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया—

  1. Bijnor Urban Co-operative Bank Ltd. vs. Meenal Agarwal
  2. State Bank of India vs. Arvind Electronics Pvt. Ltd.
  3. Sardar Associates vs. Punjab & Sind Bank

इन सभी निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—

  • OTS कर्जदार का अधिकार नहीं है,
  • इसे स्वीकार करना या न करना बैंक के व्यावसायिक विवेक का विषय है,
  • न्यायालय बैंक को OTS स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

ॲड. महेश धन्नावत की प्रतिक्रिया — बैंकों को संदेश

इस फैसले का स्वागत करते हुए ॲड. धन्नावत ने कहा—

“कलकत्ता हाईकोर्ट का यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों को और मजबूती देता है। अब कोई भी बैंक यह दावा नहीं कर सकती कि कर्जदार OTS का हकदार है। बैंक के पास SARFAESI व IBC जैसे प्रभावी कानून मौजूद हैं, ऐसे में समझौते के नाम पर कर्जदारों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना अनुचित है। यह निर्णय सभी बैंकों के लिए चेतावनी है कि वे अपनी नीतियों को स्पष्ट और निष्पक्ष रखें।”

उन्होंने कहा कि यदि किसी मामले में बैंक OTS प्रस्ताव को अस्वीकार करते समय मनमानी, भेदभाव या संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन जैसा कार्य करे, तभी न्यायालय का हस्तक्षेप संभव है।
लेकिन इस विशेष मामले में ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया।


संपर्क विवरण:

Dhannawat Law Associates
Adv. Mahesh S. Dhannawat
B.Com, LL.M, GDC&A
पूर्व उपाध्यक्ष, जालना जिला बार एसोसिएशन
पता: शिवकृपा, कालिकुर्ती, डॉ. आर. पी. रोड, जालना (महाराष्ट्र) 431203
मो.: 9326704647 / 02482-233581
ईमेल: dhannawat.mahesh@gmail.com

कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए ग्राफिक जिसमें 'वन-टाइम सेटलमेंट' कर्जदार का अधिकार नहीं है, इस संदेश को स्पष्ट किया गया है।

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