ड्यूटी पर हमला अब समझौते से नहीं बचेगा: हाईकोर्ट का सख्त और ऐतिहासिक फैसला
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि ड्यूटी के दौरान सरकारी कर्मचारियों पर किया गया हमला किसी भी स्थिति में “निजी विवाद” नहीं माना जा सकता और ऐसे मामलों में पक्षकारों के बीच हुए समझौते के आधार पर प्राथमिकी (एफआईआर) को रद्द नहीं किया जा सकता।
इस मामले में आरोपियों द्वारा सरकारी कर्मचारी से समझौता होने के आधार पर एफआईआर रद्द करने की याचिका दायर की गई थी, जिसे न्यायालय ने सख्ती से खारिज कर दिया। इसके साथ ही संबंधित विभाग के प्रशासनिक सचिव को प्रकरण में हस्तक्षेप करने और आवश्यक कदम उठाने के निर्देश भी दिए गए हैं। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि सक्षम प्रशासनिक अनुमति के बिना समझौता करने वाले सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
न्यायमूर्ति सुमित गोयल ने अपने फैसले में साफ शब्दों में कहा कि जब कोई सरकारी कर्मचारी अपने शासकीय कर्तव्यों का पालन करते हुए हमले का शिकार होता है, तो वह अपराध केवल उस व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि पूरे राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकार पर हमला होता है। इसलिए केवल समझौते के आधार पर ऐसी एफआईआर और उससे जुड़ी कानूनी कार्यवाही को समाप्त नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि:
प्राप्त जानकारी के अनुसार, राकेश, सुनील और मोहित नामक कर्मचारी हरियाणा के बेरी स्थित जाट धर्मशाला के शिकायत केंद्र पर लाइनमैन के रूप में ड्यूटी पर तैनात थे। इसी दौरान कुछ ग्रामीणों ने उस स्थान को निजी उपयोग के लिए आरक्षित बताते हुए कर्मचारियों के कार्य में जानबूझकर बाधा उत्पन्न की। स्थिति की जानकारी मिलते ही सरपंच इंद्रजीत सुहाग अपने पुत्रों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे, जहां उन्होंने कर्मचारियों के साथ गाली-गलौज की, मारपीट की और जब कर्मचारियों ने वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया तो उनका सरकारी मोबाइल फोन फेंक दिया।
इस हमले में कर्मचारी घायल हुए, जिसके बाद उनकी शिकायत पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 121(1), 132, 221 और 324(6) के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया।
राजनीतिक दबाव में होने वाले समझौतों पर लगेगा अंकुश:
इस ऐतिहासिक फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए नोटरी एसोसिएशन के कार्याध्यक्ष एडवोकेट महेश एस. धन्नावत ने कहा कि यह निर्णय देशभर के सरकारी कर्मचारियों के लिए राहत देने वाला और उनका मनोबल बढ़ाने वाला है। उन्होंने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि ड्यूटी के दौरान सरकारी कर्मचारियों पर हमले होते हैं और बाद में राजनीतिक या सामाजिक दबाव के चलते उन्हें आरोपियों के साथ समझौता करने के लिए मजबूर किया जाता है। इस फैसले से ऐसी प्रवृत्तियों पर प्रभावी रोक लगेगी।
एडवोकेट धन्नावत ने आगे कहा कि विधिक सिद्धांतों के अनुसार किसी एक उच्च न्यायालय का फैसला, जब तक उसके विरुद्ध स्थानीय उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय का अलग निर्णय नहीं आता, तब तक अन्य राज्यों के लिए भी मार्गदर्शक माना जाता है। इस कारण यह फैसला महाराष्ट्र सहित देश के अन्य राज्यों के सरकारी कर्मचारियों को भी समान रूप से संरक्षण प्रदान करेगा।
अनुमति के बिना समझौता बना सकता है नौकरी पर संकट:
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी अपने शासकीय दायित्व से जुड़े किसी आपराधिक प्रकरण में सक्षम प्रशासनिक प्राधिकरण की पूर्व अनुमति के बिना स्वतंत्र रूप से समझौता नहीं कर सकता। बिना अनुमति किया गया कोई भी समझौता संबंधित कर्मचारी को अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में ला सकता है।
यह फैसला न केवल सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा को मजबूत करता है, बल्कि यह स्पष्ट संदेश भी देता है कि कानून व्यवस्था से जुड़े कर्मियों पर हमला किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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