जालना के अधिवक्ता महेश धन्नावत ने प्रधानमंत्री को भेजा ज्ञापन — आरक्षण व्यवस्था को समयबद्ध रूप से समाप्त करने की मांग
महाराष्ट्र के जालना जिले के अधिवक्ता महेश सीताराम धन्नावत ने भारत के प्रधानमंत्री को एक विस्तृत ज्ञापन भेजकर देश में लागू आरक्षण व्यवस्था को
समयबद्ध और चरणबद्ध रूप से समाप्त करने के लिए ठोस नीति तैयार करने की मांग की है।
धन्नावत का कहना है कि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक समानता स्थापित करना था, लेकिन दशकों से इसका निरंतर विस्तार अब संविधान की मूल भावना
— समानता और बंधुत्व — के विपरीत दिशा में जा रहा है।
संविधान की भावना का हवाला
अधिवक्ता धन्नावत ने अपने ज्ञापन में लिखा कि संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को केवल एक
अस्थायी सुधारात्मक उपाय के रूप में देखा था, ताकि ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके।
उन्होंने संविधान सभा की बहसों का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुच्छेद 334 में राजनीतिक आरक्षण की अवधि केवल दस वर्ष तय की गई थी,
जो यह दर्शाता है कि यह व्यवस्था स्थायी नहीं थी।
“आरक्षण का उद्देश्य सुधार था, स्थायित्व नहीं। परंतु अब यह सुधार की दिशा से भटककर एक स्थायी ढांचे में बदल गया है।”
— अधिवक्ता महेश धन्नावत
न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों का संदर्भ
धन्नावत ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (AIR 1993 SC 477) के ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि
सर्वोच्च न्यायालय ने कुल आरक्षण को 50 प्रतिशत तक सीमित किया था और ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा इसलिए लागू की गई थी
ताकि आरक्षण का लाभ केवल वास्तविक रूप से वंचित वर्गों को मिले।
उन्होंने कहा कि यह निर्णय संविधान के उस संतुलन की याद दिलाता है जहाँ सामाजिक न्याय और समान अवसर दोनों का सम्मान किया गया था।
“आज यह संतुलन बिगड़ चुका है — आरक्षण समाज को जोड़ने के बजाय धीरे-धीरे विभाजित कर रहा है।”
आरक्षण के दुरुपयोग पर चिंता
धन्नावत ने अपने ज्ञापन में कहा कि आरक्षण अब राजनीतिक तुष्टिकरण का साधन बन गया है।
लंबे समय से आरक्षण का लाभ सीमित वर्गों तक ही पहुँच रहा है, जबकि जिन लोगों के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी, वे आज भी उपेक्षित हैं।
“आरक्षण ने सशक्तिकरण की जगह निर्भरता को जन्म दिया है। अब समय आ गया है कि इसे सम्मानजनक अंत देकर समानता की नई शुरुआत की जाए।”
— अधिवक्ता महेश धन्नावत
मराठा और EWS आरक्षण पर न्यायालय की टिप्पणियाँ
धन्नावत ने हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में मराठा आरक्षण और EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) से जुड़ी सुनवाइयों में
की गई टिप्पणियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया है कि आरक्षण
अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रह सकता।
“जब देश का सर्वोच्च न्यायालय भी कह रहा है कि आरक्षण स्थायी समाधान नहीं है, तो अब सरकार को निर्णायक कदम उठाना चाहिए।”
— अधिवक्ता महेश धन्नावत
ज्ञापन की प्रमुख मांगें
- एक उच्चाधिकार समिति का गठन किया जाए जिसमें कानूनी विशेषज्ञ, समाजशास्त्री और नीति-निर्माता शामिल हों,
जो आरक्षण व्यवस्था को चरणबद्ध और घटते क्रम में समाप्त करने की नीति तैयार करे। - उक्त नीति को लागू करने के लिए आवश्यक संवैधानिक और विधायी संशोधन शीघ्र प्रारंभ किए जाएँ।
राष्ट्रीय विमर्श के बीच नई सोच
यह ज्ञापन ऐसे समय में आया है जब देशभर में आरक्षण नीति और उसके भविष्य को लेकर व्यापक बहस जारी है।
सुप्रीम कोर्ट में क्रीमी लेयर, उप-वर्गीकरण और आरक्षण की सीमा से संबंधित कई याचिकाएँ लंबित हैं।
ऐसे माहौल में अधिवक्ता धन्नावत की यह पहल संविधान की मूल भावना —
“समानता, एकता और न्याय” — को पुनः केंद्र में लाने की दिशा में एक विचारशील कदम मानी जा रही है।

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