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राष्ट्रीय एकता दिवस: खेड़ा-बारडोली से रियासतों के विलय तक, DGIPR के विशेष लेख में सरदार पटेल का योगदान

राष्ट्रीय एकता दिवस पर सरदार वल्लभभाई पटेल का ऐतिहासिक श्वेत-श्याम चित्र
कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

छत्रपति संभाजीनगर, 31 अक्टूबर — भारत की विविधता ही उसकी ताकत है: भाषाएं अलग, संस्कृतियां अलग, परंपराएं और धर्म अलग, लेकिन देश एक है। राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर महाराष्ट्र सूचना एवं जनसंपर्क महासंचालनालय (DGIPR) के विभागीय सूचना कार्यालय, छत्रपति संभाजीनगर द्वारा जारी विशेष लेख ‘राष्ट्रीय एकात्मता के शिल्पकार सरदार वल्लभभाई पटेल’ में लौह पुरुष के जीवन और योगदान को याद किया गया है। लेख के अनुसार, सरदार पटेल की जयंती 31 अक्टूबर को इसीलिए राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाई जाती है।

राष्ट्रीय एकता दिवस पर सरदार वल्लभभाई पटेल का ऐतिहासिक श्वेत-श्याम चित्र
लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल फोटो DGIPR विभागीय सूचना कार्यालय छत्रपति संभाजीनगर

विभागीय सूचना कार्यालय के उपसंचालक (सूचना) प्रवीण टाके के इस लेख में कहा गया है कि एकात्मता केवल भावनात्मक स्तर पर नहीं टिकती; उसके लिए दूरदृष्टि, संगठन कौशल, बंधुता, निर्णय क्षमता और जरूरत पड़ने पर कठोर भूमिका लेने की तैयारी भी चाहिए। भारत के इतिहास में इन गुणों का प्रभावी उदाहरण सरदार वल्लभभाई पटेल का नेतृत्व है।

राष्ट्रीय एकता दिवस की शुरुआत कब हुई

लेख के अनुसार, भारत सरकार ने 2014 में सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया।

  • 22 अक्टूबर 2014: केंद्र सरकार ने इस फैसले की घोषणा की।
  • 24 अक्टूबर 2014: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आयोजन को लेकर आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी की।
  • 31 अक्टूबर 2014: पहला राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया गया।
  • 31 अक्टूबर 2017: महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश के जरिए इस दिन राष्ट्रीय एकता की शपथ लेने का निर्देश दिया; शैक्षणिक संस्थानों में वक्तृत्व, निबंध, नाटिका और व्याख्यान आयोजित करने की बात भी स्पष्ट की गई।

लेख में कहा गया है कि स्वतंत्रता संग्राम में पटेल के योगदान और आजादी के बाद रियासतों का विलय कर देश की एकात्मता मजबूत करने के ऐतिहासिक काम को नई पीढ़ी तक पहुंचाना इस फैसले का मुख्य उद्देश्य था। इस दिन ‘रन फॉर यूनिटी’, राष्ट्रीय एकता की शपथ और संचलन जैसे कार्यक्रमों से देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा का संदेश दिया जाता है।

किसानों के सवालों से गढ़ा गया नेतृत्व

31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में जन्मे वल्लभभाई पटेल वकालत में सफल थे, लेकिन महात्मा गांधी के विचारों के प्रभाव और देश की आजादी की ललक ने उन्हें सार्वजनिक जीवन की ओर मोड़ा। लेख के अनुसार, 1918 का खेड़ा सत्याग्रह उनके नेतृत्व का अहम पड़ाव बना। फसल नुकसान और आर्थिक तंगी के कारण लगान भरने में असमर्थ किसानों के लिए उन्होंने संगठित संघर्ष खड़ा किया।

1928 के बारडोली सत्याग्रह ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान दी। बढ़े हुए लगान के खिलाफ किसानों ने एकजुटता दिखाई और पटेल ने आंदोलन का प्रभावी संगठन किया। अनुशासित, दृढ़ और अहिंसक संघर्ष के बल पर मिली इस सफलता के बाद किसानों ने ही उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि दी। लेख के शब्दों में, यह उपाधि केवल सम्मान नहीं, बल्कि जनता के भरोसे की पावती थी।

देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल का श्वेत-श्याम पोर्ट्रेट, जिन्होंने रियासतों का विलय कराया
सरदार वल्लभभाई पटेल फोटो DGIPR

जनसेवा से स्वतंत्रता संग्राम तक

अहमदाबाद नगरपालिका में काम करते हुए उन्होंने शहर की स्वच्छता, जलापूर्ति और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में सुधार पर जोर दिया। लेख कहता है कि सार्वजनिक पद अधिकार जताने का साधन नहीं, बल्कि नागरिकों की बुनियादी समस्याएं सुलझाने की जिम्मेदारी है, यह दृष्टिकोण उनके काम में दिखता था। आगे चलकर अहमदाबाद नगरपालिका का यही अध्यक्ष देश का लौह पुरुष कहलाया।

1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई और जेल भी गए। संगठन कौशल, निर्णय क्षमता और लोगों को जोड़ने की क्षमता के बल पर वे राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए।

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आजादी के बाद की ऐतिहासिक जिम्मेदारी: रियासतों का विलय

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन लेख के अनुसार इससे देश की राजनीतिक एकात्मता पूरी नहीं हुई थी। उस समय ब्रिटिश भारत के साथ 560 से अधिक रियासतें मौजूद थीं। कई रियासतों के सामने स्वतंत्र रहने या भारत-पाकिस्तान में से किसी एक में शामिल होने के विकल्प थे, और देश का राजनीतिक विभाजन टालना नए नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती थी।

स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री के रूप में सरदार पटेल ने रियासतों के विलय की जिम्मेदारी संभाली। वी. पी. मेनन जैसे अधिकारियों के सहयोग से उन्होंने रियासतों के शासकों से चर्चा, समझाइश, कूटनीति और परिस्थिति के अनुसार दृढ़ प्रशासनिक फैसलों का इस्तेमाल किया। लेख के अनुसार, यह काम केवल राजनीतिक समझौतों का नहीं था, बल्कि भारत की भौगोलिक अखंडता और प्रशासनिक स्थिरता की नींव था।

जूनागढ़ और हैदराबाद: निर्णय क्षमता की कसौटी

जूनागढ़ रियासत का सवाल उठने पर पटेल ने भारत के भौगोलिक और राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर निर्णायक भूमिका ली। हैदराबाद रियासत के विलय का प्रश्न और जटिल रहा। बातचीत और प्रयासों के बाद भी हल न निकलने पर सितंबर 1948 में ‘ऑपरेशन पोलो’ नाम से पुलिस कार्रवाई की गई और 17 सितंबर 1948 को हैदराबाद के विलय का रास्ता साफ हुआ। (मराठवाड़ा और जालना के संदर्भ में यह इतिहास हमारी ऑपरेशन पोलो रिपोर्ट में विस्तार से पढ़ें।)

लेख में यह भी उल्लेख है कि रियासतों के विलय के साथ पटेल ने स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक ढांचे को सक्षम बनाने पर जोर दिया और अखिल भारतीय सेवाओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देश के अलग-अलग हिस्सों में सतत और समन्वित प्रशासन राष्ट्रीय एकात्मता के लिए जरूरी है, इसका उन्हें पूरा भान था।

एकजुट भारत की नींव

लेख का निष्कर्ष है कि आजादी की दहलीज पर भारत के सामने केवल विदेशी सत्ता से मुक्ति की नहीं, बल्कि अनेक रियासतों, अलग-अलग राजनीतिक हितों और अनिश्चित भविष्य को एक राष्ट्रीय ढांचे में लाने की भी चुनौती थी। सरदार पटेल ने दूरदृष्टि, कूटनीति, साहस और दृढ़ निर्णय क्षमता के बल पर विलय को गति दी, जिससे आधुनिक भारत की राजनीतिक एकात्मता की नींव मजबूत हुई।

इसलिए, लेख के अनुसार, उनकी जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाना इतिहास का गौरव करने के साथ-साथ भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा बनाए रखने के संकल्प को दोहराने का दिन है। सरदार पटेल के जीवन पर और जानकारी के लिए विकिपीडिया और सरकारी सूचनाओं के लिए DGIPR की आधिकारिक वेबसाइट देखें। राज्य की और खबरें महाराष्ट्र न्यूज़ सेक्शन में पढ़ें।

स्रोत: विशेष लेख – राष्ट्रीय एकता दिवस, प्रवीण टाके, उपसंचालक (सूचना), विभागीय सूचना कार्यालय, छत्रपति संभाजीनगर (DGIPR)

रिपोर्ट: इमरान सिद्दीकी, जालना


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Imran Siddiqui
Imran Siddiqui is a senior journalist and editor of NewsNationOnline, with over 17 years of experience covering news, politics, education and social issues in Maharashtra.

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