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कोर्ट चेंबर में बाल विवाह कराने वाले वकील पर आपराधिक मुकदमे का आदेश, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सनद रद्द करने को कहा

इलाहाबाद हाईकोर्ट के बाल विवाह मामले में आदेश से जुड़ी खबर के लिए न्यायालय का हथौड़ा और तराजू (प्रतीकात्मक)
कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

जालना, 31 अक्टूबर — जिला न्यायालय परिसर स्थित अपने चेंबर में एक नाबालिग लड़की का बाल विवाह कराने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति बबिता राणी की खंडपीठ ने संबंधित वकील के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने वकील के इस आचरण को वकालत जैसे उदात्त और प्रतिष्ठित पेशे को कलंकित करने वाला, लज्जाजनक और अत्यंत निंदनीय बताया। जालना के अधिवक्ता महेश धन्नावत द्वारा जारी विज्ञप्ति में इस अदालती फैसले की जानकारी दी गई है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के बाल विवाह मामले में आदेश से जुड़ी खबर के लिए न्यायालय का हथौड़ा और तराजू (प्रतीकात्मक)
प्रतीकात्मक चित्र

हाईकोर्ट ने कानपुर नगर के जिला न्यायाधीश को तत्काल कानूनी कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है, वहीं उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को संबंधित वकील की सनद (लाइसेंस) रद्द कर दो महीने में रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।

एक नजर में

  • खंडपीठ: न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति बबिता राणी, इलाहाबाद हाईकोर्ट
  • आदेश: संबंधित वकील पर आपराधिक मुकदमा; कानपुर नगर के जिला न्यायाधीश को तत्काल कार्रवाई का निर्देश
  • बार काउंसिल: उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को सनद रद्द कर दो महीने में रिपोर्ट देने का आदेश
  • रकम: ली गई रकम वरिष्ठ निबंधक के पास जमा करने का आदेश
  • अगली सुनवाई: 15 नवंबर

कोर्ट चेंबर में बाल विवाह: कैसे सामने आया मामला

यह पूरा मामला उन्नाव जिले के माखी पुलिस थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2) और धारा 87 के तहत दर्ज एफआईआर को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में याचिकाकर्ता क्रमांक 2 लड़की की उम्र का मुद्दा उठने पर सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि शैक्षणिक अभिलेखों के अनुसार उसकी वास्तविक जन्मतिथि 16 अक्टूबर 2008 है और वह नाबालिग है, जबकि केवल पहचान पत्र में दर्ज 18 अप्रैल 2007 की जन्मतिथि के आधार पर उसका विवाह करा दिया गया था।

विज्ञप्ति के अनुसार, इस मामले में प्रतिवादी क्रमांक 4, कानपुर नगर के वकील और ‘आर्य समाज प्रतिनिधि सभा, कटरा’ संस्था के प्रधान प्रकाश पांडे (रंगेश) ने शैक्षणिक दस्तावेजों की कोई पुष्टि किए बिना यह बाल विवाह करा दिया था।

फर्जी प्रमाणपत्र, सप्तपदी के बिना विवाह

अदालती कार्यवाही में सामने आया कि इसके बदले संबंधित वकील ने 15,000 रुपये लिए थे और 2023 में किसी अन्य जोड़े के लिए इस्तेमाल किया जा चुका अनुक्रमांक ‘ए-14758’ डालकर फर्जी विवाह प्रमाणपत्र दिया गया था। साथ ही आर्य समाज के नियमों के अनुसार आवश्यक सप्तपदी विधि किए बिना केवल माला पहनाकर और फोटो खींचकर यह अवैध विवाह कराया गया था।

कानपुर नगर के जिला न्यायाधीश की जांच के दौरान जेल से लाए गए याचिकाकर्ता ने न्यायालय परिसर में संबंधित चेंबर की सटीक पहचान की, जिससे वकील द्वारा अदालत में किया गया बचाव का दावा झूठा और भ्रामक साबित हुआ।

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“न्यायालय परिसर विवाह केंद्र नहीं बन सकते”

सुप्रीम कोर्ट के ‘इलावरसन बनाम पुलिस अधीक्षक (2023)’ के मार्गदर्शक फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायालय परिसर या वकीलों के चेंबर विवाह केंद्र नहीं बन सकते और ऐसा कृत्य सीधे बाल विवाह प्रतिषेध कानून के तहत आपराधिक अपराध है। अदालत ने संबंधित वकील को ली गई रकम वरिष्ठ निबंधक (सीनियर रजिस्ट्रार) के पास जमा करने का आदेश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 15 नवंबर को तय की है।

जालना के वकीलों को भी सतर्क रहने की जरूरत: महेश धन्नावत

इस ऐतिहासिक और कठोर फैसले का स्वागत करते हुए जालना के अधिवक्ता महेश धन्नावत ने कहा कि यह निर्णय पूरे देश की न्याय व्यवस्था के लिए मार्गदर्शक है और यह कड़ा संदेश देता है कि कानून सबके लिए समान है। उन्होंने कहा कि वकालत न्याय की रक्षा करने वाला पवित्र पेशा है, इसलिए न्यायालय परिसर में इस तरह बाल विवाह कराना अक्षम्य है।

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धन्नावत ने कहा कि उत्तर प्रदेश की इस घटना से महाराष्ट्र और विशेषकर जालना जिले के वकीलों और जागरूक नागरिकों को अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। विवाह से जुड़े मामलों में उम्र के सटीक प्रमाण के लिए केवल साधारण पहचान पत्रों पर निर्भर न रहकर स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र या आधिकारिक जन्म पंजीकरण प्रमाणपत्र की गहन जांच होनी चाहिए। उन्होंने आह्वान किया कि जालना जिले में बाल विवाह की एक भी कुप्रथा बर्दाश्त न हो, इसके लिए सभी को अत्यंत कठोर भूमिका अपनानी चाहिए।

संदर्भ: बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की और 21 वर्ष से कम उम्र का लड़का ‘बालक’ माना जाता है। ऐसे किसी भी पक्ष का विवाह बाल विवाह की श्रेणी में आता है। हाईकोर्ट से जुड़ी आधिकारिक जानकारी इलाहाबाद हाईकोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वकील के खिलाफ क्या आदेश दिया?
उत्तर: विज्ञप्ति के अनुसार खंडपीठ ने वकील के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने, कानपुर नगर के जिला न्यायाधीश को तत्काल कानूनी कार्रवाई शुरू करने और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को सनद रद्द कर दो महीने में रिपोर्ट देने का आदेश दिया है।

प्रश्न: लड़की की उम्र को लेकर क्या तथ्य सामने आए?
उत्तर: सरकारी पक्ष के अनुसार शैक्षणिक अभिलेखों में लड़की की जन्मतिथि 16 अक्टूबर 2008 है, जबकि विवाह पहचान पत्र में दर्ज 18 अप्रैल 2007 की जन्मतिथि के आधार पर कराया गया था।

प्रश्न: विवाह के समय उम्र की पुष्टि कैसे करनी चाहिए?
उत्तर: अधिवक्ता महेश धन्नावत के अनुसार केवल साधारण पहचान पत्र पर निर्भर रहने के बजाय स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र या आधिकारिक जन्म पंजीकरण प्रमाणपत्र की गहन जांच होनी चाहिए।

अदालती फैसलों से जुड़ी और खबरें पढ़ें: जजमेंट

रिपोर्ट: इमरान सिद्दीकी, जालना


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Imran Siddiqui
Imran Siddiqui is a senior journalist and editor of NewsNationOnline, with over 17 years of experience covering news, politics, education and social issues in Maharashtra.

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