16 अक्टूबर 2026 | आज की मौलिक शायरी
हर एहसास को आवाज़ देना आसान नहीं होता। कभी हम बहुत कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन शब्द साथ नहीं देते। ऐसे में ख़ामोशी भी रिश्तों, संवेदनाओं और आत्मसम्मान की अपनी भाषा बन जाती है। ‘आज के अल्फ़ाज़’ की आज की कड़ी इसी अनकही दुनिया को समर्पित है।
आज की शायरी: ख़ामोशी की ज़ुबान
हर बात को आवाज़ मिले, यह ज़रूरी तो नहीं,
कुछ दर्द को अल्फ़ाज़ मिले, यह ज़रूरी तो नहीं।
जो चुप रहा, उसे कमज़ोर समझ बैठे लोग,
वह अपने भीतर कई तूफ़ान सँभाले बैठा था।
बोलने से पहले दिल का हाल जान लेना,
कभी एक लफ़्ज़ भी उम्र भर याद रहता है।
किसी की चुप्पी पर फ़ैसला मत सुनाना,
कभी सन्नाटा भी पूरी दास्तान कहता है।
लफ़्ज़ थोड़े हों मगर उनमें अदब बाकी रहे,
बात पूरी हो न हो, दिल में जगह बाकी रहे।
जब शोर थम गया तो समझ आई यह बात,
सुनना भी मोहब्बत है, सिर्फ़ कहना ही नहीं।
इन शेरों का पैग़ाम
ख़ामोशी का अर्थ हर बार नाराज़गी, हार या सहमति नहीं होता। कभी इंसान सोचने के लिए ठहरता है, कभी वह सही शब्द तलाशता है और कभी किसी दूसरे को बिना टोके सुनना चाहता है। इस शायरी का संदेश यही है कि बातचीत में सम्मान के साथ सुनना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना बोलना।
आज का विचार
अच्छी बातचीत सिर्फ़ सही शब्द चुनने से नहीं, दूसरे की बात को जगह देने से बनती है।
रचनात्मक श्रेय: NewsNationOnline की ‘आज के अल्फ़ाज़’ श्रृंखला के लिए तैयार मौलिक शेर और विचार। किसी प्रसिद्ध शायर के नाम से इनका गलत श्रेय नहीं दिया गया है।
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