6 नवंबर 2026 | मौलिक हिंदी कविता
कक्षा की घंटी बजने के बाद भी कुछ बातें वहीं रह जाती हैं—ब्लैकबोर्ड पर अधूरा सवाल, खिड़की से आती धूप और वह हिम्मत, जो किसी बच्चे को पहली बार अपना सवाल पूछने पर मिलती है। आज की कविता इसी छोटी-सी हिम्मत के नाम है।
आज की कविता: सवाल पूछने वाला बच्चा
सबने अपनी कॉपी खोली,
सबने एक-सा उत्तर लिखा,
पीछे बैठा एक बच्चा
खिड़की के उस पार दिखा।
उसने धीरे हाथ उठाया,
आवाज़ ज़रा काँप रही थी,
“यह बात ऐसी क्यों होती है?”
आँखों में जिज्ञासा जाग रही थी।
कुछ बच्चों की हँसी उभरी,
उसका चेहरा झुकने लगा,
तभी शिक्षक ने मुस्काकर
उसको आगे बोलने को कहा।
“जो समझ न आए, पूछो तुम,
सवाल कोई छोटा नहीं,
सीखने की राह में बच्चों,
जिज्ञासा से बड़ा सहारा नहीं।”
फिर एक हाथ और भी उठा,
फिर तीसरा भी साथ आया,
कल तक जो कमरा चुप रहता,
उसमें नया उजाला छाया।
शाम हुई, सब घर को निकले,
बस्ता कंधे पर रखकर,
एक बच्चा लौटा इस बार
अपने मन का डर कम करके।
ब्लैकबोर्ड पर बचा सवाल
अगले दिन तक ठहरा था,
उस छोटे-से प्रश्न के भीतर
सीखने का एक सवेरा था।
कविता का भावार्थ
यह कविता उस बच्चे की है जो उत्तर याद करने के बजाय उसका कारण जानना चाहता है। प्रश्न पूछने पर उसका मज़ाक उड़ता है, लेकिन शिक्षक के प्रोत्साहन से पूरी कक्षा में खुलकर सीखने का माहौल बनता है। बच्चों को सवाल पूछने की सुरक्षित जगह देना शिक्षा का एक ज़रूरी हिस्सा है।
आज का विचार
जहाँ सवाल पूछने की आज़ादी होती है, वहाँ सीखने का आत्मविश्वास बढ़ता है।
यह कविता NewsNationOnline की ‘आज के अल्फ़ाज़’ श्रृंखला के लिए मौलिक रूप से लिखी गई है। इसे किसी अन्य कवि के नाम से प्रस्तुत नहीं किया गया है।
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