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आज के अल्फ़ाज़: रिश्तों की सिलाई | 7 नवंबर की मौलिक शायरी

लकड़ी की मेज पर सिलाई का सामान और मरम्मत की हुई नीली कमीज़
कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

7 नवंबर 2026 | मौलिक देवनागरी शायरी

कपड़े की उधड़ी सिलाई दिखाई देती है, लेकिन रिश्तों में आई छोटी दरार अक्सर नज़र नहीं आती। आज की शायरी उन अनकहे लफ़्ज़ों, माफ़ी और अपनापन लौटाने की कोशिशों के नाम है, जो दूरियों को कम कर सकती हैं।

आज की शायरी: रिश्तों की सिलाई

रिश्तों की सिलाई में धागा यक़ीन का रख,
टूटे हुए लम्हों में थोड़ा सुकून का रख।

हर बात पे जीतोगे तो तन्हा भी रहोगे,
कुछ हार में अपनों का साथ बचा के रखोगे।

लफ़्ज़ों की नोक से जो दिल में निशान हुआ,
एक सच्ची माफ़ी से हल्का वो बोझ हुआ।

चुप्पी को हमेशा तू नाराज़गी न समझ,
थक कर जो बैठा है, उसे बेदिली न समझ।

जो लौट के आया है, उसे सुन तो ज़रा,
हर देर के पीछे कोई कहानी भी होगी भला।

नाज़ुक-सी डोर है, इसे खींचा न कीजिए,
जो बात कहनी हो, उसे प्यार से कहिए।

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रफ़ू हो भी जाए तो निशान रह सकते हैं,
इन्हीं निशानों के संग रिश्ते सँवर सकते हैं।

शायरी का भावार्थ

इस रचना में सिलाई और रफ़ू रिश्तों की देखभाल के प्रतीक हैं। हर मतभेद का हल जीतना नहीं होता; कभी सामने वाले की बात पूरी सुनना, अपनी गलती मानना और भरोसा धीरे-धीरे लौटाना ज़्यादा ज़रूरी होता है। माफ़ी का मतलब हर चोट को भुला देना नहीं, बल्कि जहाँ सम्मान और सुरक्षा हो, वहाँ बेहतर बातचीत की गुंजाइश बनाना है।

आज का विचार

रिश्तों को सँभालने के लिए बड़े वादों से पहले छोटे, भरोसेमंद काम ज़रूरी हैं।

यह शायरी NewsNationOnline की ‘आज के अल्फ़ाज़’ श्रृंखला के लिए मौलिक रूप से लिखी गई है। इसे किसी अन्य शायर के नाम से नहीं जोड़ा गया है।

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Imran Siddiqui
Imran Siddiqui is a senior journalist and editor of NewsNationOnline, with over 17 years of experience covering news, politics, education and social issues in Maharashtra.

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