15 अक्टूबर 2026 | मौलिक हिंदी कविता
हर खुशी किसी बड़ी उपलब्धि से नहीं मिलती। कभी सुबह की धूप, चाय की खुशबू, किसी अपने की आवाज़ या खिड़की पर आई चिड़िया भी पूरे दिन को खूबसूरत बना देती है। ‘आज के अल्फ़ाज़’ की इस नई कड़ी में पेश है रोज़मर्रा की छोटी खुशियों को समर्पित मौलिक कविता।
आज की कविता: छोटी खुशियों का घर
खिड़की पर धूप उतरी, चुपके से मुस्काई,
मिट्टी के छोटे गमले में पीली कली खिल आई।
चाय की पहली चुस्की ने दिन को नाम दिया,
आँगन आई गौरैया ने मीठा-सा पैग़ाम दिया।
कितनी चीज़ें पास रहीं, हमने देखा ही नहीं,
दौड़ते-दौड़ते ठहरने का मतलब सीखा ही नहीं।
माँ की आवाज़, दोस्त का हँसकर हाल पूछना,
थके हुए मन को जैसे थोड़ी देर सुकून मिलना।
न कोई ऊँची मंज़िल, न चमकता कोई ताज,
रोटी की खुशबू में भी छिपा है जीवन का राज।
सारी खुशियाँ शोर करें, ऐसा ज़रूरी तो नहीं,
जो पल दिल में बस जाए, वह मामूली तो नहीं।
आज ज़रा धीरे चलकर यह दुनिया देखेंगे,
छोटी-छोटी खुशियों से अपना घर भर लेंगे।
कविता का भाव
हम अक्सर सोचते हैं कि खुश रहने के लिए कुछ असाधारण होना चाहिए। इसी इंतज़ार में कई साधारण लेकिन कीमती पल अनदेखे रह जाते हैं। यह कविता उन पलों की तरफ ध्यान दिलाती है जिन्हें पैसे या प्रसिद्धि से नहीं तौला जा सकता। अपनों के साथ बिताया समय, रोज़ की छोटी राहतें और आसपास की सुंदरता जीवन को अर्थ देती हैं।
आज का विचार
खुशी हमेशा दूर नहीं होती; कभी वह हमारी रोज़ की आदतों के बीच चुपचाप बैठी मिलती है।
रचनात्मक श्रेय: न्यूज़नेशन ऑनलाइन की ‘आज के अल्फ़ाज़’ श्रृंखला के लिए तैयार मौलिक रचना।
इस श्रृंखला की अन्य मौलिक रचनाएं पढ़ें: आज के अल्फ़ाज़ संग्रह और पावसानंतरची पहाट, रिश्तों की नरमी और उम्मीद का उजाला।
कविता और साहित्य के बारे में और जानें
कविता की विधा, उसके रूप और साहित्यिक परंपरा की सामान्य जानकारी के लिए एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका का कविता परिचय पढ़ सकते हैं। यह बाहरी संदर्भ कविता की पृष्ठभूमि समझने के लिए है; ऊपर प्रकाशित मौलिक रचना का स्रोत नहीं है।
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