29 अक्टूबर 2026 | आज की मौलिक देवनागरी शायरी
भागते शहर में सड़क किनारे खड़ा एक पेड़ किसी से कुछ कहता नहीं, फिर भी उसकी छाँव कई लोगों को कुछ देर रुकने की जगह देती है। ‘आज के अल्फ़ाज़’ की आज की शायरी इसी मामूली दिखने वाली, मगर अनमोल मेहरबानी पर है—एक ऐसी नेमत जो सबको बराबर मिलती है।
आज की शायरी: छाँव का पता
तपती हुई सड़क पर जो एक पेड़ खड़ा है,
उसकी छाँव में शहर का थोड़ा सुकून पड़ा है।
न उसने राहगीरों से कभी पहचान माँगी,
हवा बाँटी तो बदले में कोई मुस्कान न माँगी।
किसी ने थैला रखा, कोई पल भर बैठ गया,
किसी का तेज़ चलता दिन वहीं कुछ ठहर गया।
ये पत्ते सिर्फ़ मौसम की कहानी ही नहीं कहते,
ये चुपचाप कई पंछियों के घर भी बने रहते।
किसी बच्चे ने मिट्टी में जो नन्हा बीज बोया था,
उसी उम्मीद ने बरसों में ये आँगन सँजोया था।
बड़ा होना अगर सीखो तो उस शाख़ से सीखो,
जो ऊपर उठके भी नीचे ज़मीं से जुड़ी रहती है।
जहाँ कल धूप से बचने को कोई जगह न होगी,
वहाँ आज की बचाई छाँव बड़ी दुआ होगी।
इन शेरों का भावार्थ
पेड़ की छाँव यहाँ बिना भेदभाव के दी जाने वाली मदद का प्रतीक है। राहगीर थोड़ी देर विश्राम करते हैं, पंछियों को ठिकाना मिलता है और एक बच्चे का लगाया बीज समय के साथ सबके काम आता है। शायरी हमें याद दिलाती है कि किसी जगह को बेहतर बनाने के लिए कभी-कभी बस उसे सँभालना और आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाए रखना काफ़ी होता है।
आज का विचार
जो छाँव आज हमें मिली है, उसे बचाना कल आने वालों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।
रचनात्मक श्रेय: NewsNationOnline की ‘आज के अल्फ़ाज़’ श्रृंखला के लिए लिखी गई मौलिक शायरी। इसे किसी अन्य शायर के नाम से प्रस्तुत नहीं किया गया है।
आज के अल्फ़ाज़ की और रचनाएँ
आज के अल्फ़ाज़ का पूरा संग्रह देखें। पिछली कड़ियों में मैदान की आख़िरी गेंद (हिंदी कविता), रेल्वेच्या खिडकीतलं गाव (मराठी कविता) और सच की धीमी आवाज़ (शायरी) पढ़ें।
कविता की साहित्यिक परंपरा के सामान्य परिचय के लिए एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका देखें। यह बाहरी संदर्भ इस मौलिक रचना का स्रोत नहीं है।
Discover more from NewsNation Online
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

















Leave a Reply