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जालना में सूखे की मार: मोसंबी के बागों पर कुल्हाड़ी, 38 हजार हेक्टेयर से अधिक फल बागान संकट में

पेड़ पर लगे खट्टे फलों का बाग, जालना में मोसंबी की खेती से संबंधित सांकेतिक तस्वीर
कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

मोसंबी के 29,347 हेक्टेयर क्षेत्र पर सिंचाई संकट; हस्तपोखरी और वडीगोद्री के किसानों ने सुनाई पेड़ काटने की मजबूरी, नुकसान के सर्वे और राहत की मांग

जालना (विशेष रिपोर्ट). पानी की गंभीर कमी ने जालना जिले के फल उत्पादक किसानों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है. वर्षों के निवेश और देखभाल से तैयार मोसंबी, अंगूर और अन्य फलों के बागों को सिंचाई उपलब्ध कराना मुश्किल होता जा रहा है. उपलब्ध स्थानीय रिपोर्ट में जिले का कुल फल बागान क्षेत्र लगभग 38,542 हेक्टेयर बताया गया है. यह कुल बागवानी क्षेत्र है, न कि इतने क्षेत्र के नष्ट होने का प्रमाण. किसानों की चिंता है कि पानी का संकट लंबा खिंचा तो और बागों को नुकसान पहुंच सकता है.

जालना की मोसंबी उत्पादन केंद्र के रूप में पहचान है. महाराष्ट्र सरकार के भूजल सर्वेक्षण एवं विकास अभिकरण की जिला प्रोफाइल भी मोसंबी उत्पादन में जिले की प्रमुख भूमिका बताती है. उपलब्ध स्थानीय क्षेत्रफल विवरण में अकेले मोसंबी के बाग 29,347.35 हेक्टेयर बताए गए हैं. बारिश की कमी और घटते जलस्रोतों का सबसे बड़ा जोखिम इसी बारहमासी खेती को है.

किसानों की मजबूरी: वर्षों पुराने बागों पर चलानी पड़ी कुल्हाड़ी

हस्तपोखरी के किसान दिनेश वाघ ने स्थानीय रिपोर्ट में बताया कि उनके पास एक हजार फलदार पेड़ थे, लेकिन पानी उपलब्ध नहीं होने के कारण बाग काटना पड़ा. उन्होंने सरकार से शीघ्र सहायता देने की मांग की. इसी गांव के राजू चेपटे के अनुसार, लगभग 15 वर्ष पहले लगाए गए एक हजार पेड़ भी पानी के अभाव में हटाने पड़े और शेष पेड़ों को बचाना कठिन हो रहा है. वडीगोद्री के श्रीराम नलावडे ने सात वर्ष पुराना मोसंबी बाग काटने की मजबूरी बताते हुए राहत की अपील की.

फलदार पेड़ को तैयार होने और नियमित उत्पादन देने में वर्षों का समय लगता है. इसलिए पेड़ों का सूखना एक मौसम की उपज के नुकसान से अधिक गंभीर है. पुराने बाग उजड़ने पर किसान को पौधारोपण, सिंचाई व्यवस्था और देखभाल में दोबारा निवेश करना पड़ता है. तब तक आय प्रभावित हो सकती है.

मोसंबी के बाद अंगूर उत्पादक भी चिंतित

कडवंची क्षेत्र के अंगूर उत्पादकों ने भी पानी के अभाव में बाग सूखने और उत्पादन घटने का खतरा जताया है. स्थानीय आंकड़ों के अनुसार जिले में अंगूर का क्षेत्र 1,816 हेक्टेयर है, जबकि अनार 2,577 और सीताफल 1,305 हेक्टेयर पर लगा है. इन फसलों के वास्तविक नुकसान का अलग-अलग सर्वे आवश्यक है.

जिले में किस फल का कितना क्षेत्र?

फललागवड़ क्षेत्र (हेक्टेयर)
मोसंबी29,347.35
अनार2,577
अंगूर1,816
सीताफल1,305
अमरूद985.6
आम755.6
नींबू532.8
केला459.2
चीकू215.6
पपीता107.4
ड्रैगन फ्रूट79.2
संतरा70.1
बेर25.2
आंवला17.6
अन्य28

संपादकीय स्पष्टता: मूल रिपोर्ट में कुल क्षेत्र 38,542 हेक्टेयर है, जबकि ऊपर दिए गए फलवार आंकड़ों का योग 38,321.05 हेक्टेयर है. इस 220.95 हेक्टेयर अंतर की विभागीय पुष्टि अभी बाकी है. दोनों आंकड़ों को प्रभावित या नष्ट बागों का निश्चित क्षेत्र न समझें.

कम वर्षा ने बढ़ाया जलसंकट

अक्टूबर की शुरुआत में प्रकाशित मौसमी आकलन के मुताबिक जून से सितंबर के दौरान जालना में सामान्य का लगभग 74.7 प्रतिशत वर्षा दर्ज हुई थी. पूरे मराठवाड़ा में यह अनुपात लगभग 65.5 प्रतिशत रहा. स्थानीय रिपोर्ट में घनसावंगी की वर्षा 321.3 मिलीमीटर, अंबड की 384.3, बदनापुर की 450.1, परतूर की 456.1, जाफराबाद की 465.4, मंठा की 482.4, भोकरदन की 484.3 और जालना तहसील की 507.8 मिलीमीटर बताई गई है. एक ही जिले में बारिश के इस अंतर से सिंचाई की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है.

18 अक्टूबर की किसान तक की रिपोर्ट में जालना के मोसंबी बागों में नमी की कमी और फल झड़ने से हुए नुकसान की जानकारी सामने आई थी. इसी तरह पुढारी की अक्टूबर रिपोर्ट में मोसंबी उत्पादकों पर जलसंकट के साथ कीमतों के दबाव का भी उल्लेख है. ये स्वतंत्र रिपोर्टें चिंता की पुष्टि करती हैं, लेकिन हर बाग के नुकसान की सटीक मात्रा निर्धारित नहीं करतीं.

860 गांवों तक प्रशासन की पहुंच, किसानों को राहत की प्रतीक्षा

जिलाधिकारी आशिमा मित्तल के प्रशासन ने सूखे की स्थिति में किसानों की शिकायतें और जरूरतें जानने के लिए 860 गांवों में संवाद बैठकें आयोजित की थीं. इनमें फसल नुकसान, पेयजल, चारा और सहायता योजनाओं जैसे मुद्दे उठे. NewsNationOnline की 20 अक्टूबर की रिपोर्ट में खरीफ नुकसान के लगभग 90 प्रतिशत ई-पंचनामे पूरा होने की जानकारी दी गई थी. हालांकि सामान्य खरीफ नुकसान का सर्वे अपने आप में हर बारहमासी फल बाग के नुकसान के मूल्यांकन या सहायता पात्रता की पुष्टि नहीं करता.

प्रभावित किसानों की मांग है कि सूखते फल बागों का अलग और समयबद्ध पंचनामा हो, सहायता के मानदंड स्पष्ट किए जाएं तथा उपलब्ध जलस्रोतों के आधार पर बाग बचाने के उपायों को प्राथमिकता मिले. पेयजल संकट और बागवानी की सिंचाई के बीच संसाधनों का संतुलित नियोजन प्रशासन के सामने चुनौती है.

आने वाले महीनों में क्या होगा?

फिलहाल किसानों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि वे बचे हुए पेड़ों को अगले मानसून तक कैसे जीवित रखें. खेती पर सूखे का प्रभाव केवल पैदावार घटने तक सीमित नहीं है; वर्षों के निवेश का नुकसान, नए पौधों का खर्च और आय में लंबा अंतराल भी इसके साथ जुड़ा है. किसानों ने सरकार से तात्कालिक राहत के साथ स्थायी जल संरक्षण तथा सिंचाई उपायों की मांग की है.

संबंधित समाचार: जालना में मानसून की कमी, 860 गांवों में किसान संवाद, पेयजल संरक्षण की योजना. आधिकारिक संदर्भ: महाराष्ट्र भूजल सर्वेक्षण विभाग: जालना जिला.


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Imran Siddiqui
Imran Siddiqui is a journalist based in Jalna, Maharashtra, and district representative for Navbharat (previously with Lokmat Samachar). He edits NewsNation Online, covering Jalna, Marathwada, Maharashtra and India, and ImranJalna, covering Islamic knowledge and Muslim-world news in English, Hindi and Urdu.

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