25 अक्टूबर 2026 | मौलिक हिंदी कविता
तेज़ी से बदलते बाज़ार में कोई चीज़ पुरानी या थोड़ी-सी ख़राब हो जाए, तो उसे बदल देना आसान लगता है। लेकिन मोहल्ले के रफ़ूगर और दर्ज़ी आज भी हमें एक अलग हुनर याद दिलाते हैं—जो हमारे पास है, उसकी देखभाल करना। ‘आज के अल्फ़ाज़’ की आज की कविता एक छोटी सिलाई की दुकान और वहाँ काम करने वाले कारीगर के श्रम को समर्पित है।
आज की कविता: रफ़ूगर की मेज़
गली के आख़िरी मोड़ पर छोटी-सी दुकान,
खिड़की से छनती धूप, मेज़ पर धागों का जहान.
किसी कमीज़ का बटन, किसी आँचल का किनारा,
हर कपड़े में छिपा था बीते दिनों का नज़ारा.
नीली कमीज़ की कोहनी पर छोटा-सा निशान था,
पहनने वाले के लिए वह अब भी ख़ास सामान था.
कारीगर ने ध्यान से उसी रंग का धागा चुना,
उधड़ी हुई बुनावट में फिर एक रास्ता बुना.
वह जानता था, हर सिलवट मिटाई नहीं जाती,
हर पुरानी चीज़ नई जैसी बनाई नहीं जाती.
फिर भी उसकी सुई ने इतना काम कर दिया,
कपड़े को अगले सफ़र के क़ाबिल कर दिया.
पास पड़ी थी एक थैली, कई बार सिली हुई,
सब्ज़ी और किताबों के सफ़रों से मिली हुई.
नए सामान की चमक से अलग उसका मान था,
बरसों साथ निभाना ही उसकी पहचान था.
जहाँ फेंक देना आसान था, वहाँ ठहरकर देखा,
एक छोटे टाँके ने काम का नया दिन लिखा.
कैंची, सुई और धागे का सीधा-सा यह संसार,
मेहनत से बचा लेता था कितनी चीज़ें हर बार.
शाम ढली तो मेज़ से सारे धागे समेटे गए,
सिले हुए कपड़े अपने-अपने घर ले जाए गए.
कारीगर के नाम कोई बड़ा ऐलान नहीं आया,
पर अगली सुबह किसी ने फिर दरवाज़ा खटखटाया.
कविता का भावार्थ
यह कविता एक साधारण कारीगर के काम में छिपी उपयोगिता और गरिमा को देखती है। कपड़ों को रफ़ू करना सिर्फ़ छेद भरना नहीं, बल्कि चीज़ों की उम्र बढ़ाने का व्यावहारिक तरीका भी है। हर वस्तु को बचाना संभव नहीं होता, फिर भी जहाँ मरम्मत सुरक्षित और उपयोगी हो, वहाँ उसे एक और अवसर देना समझदारी है। कविता उन हाथों के प्रति आदर व्यक्त करती है, जिनका श्रम अक्सर हमारी नज़र से ओझल रहता है।
आज का विचार
हर नई चीज़ ख़ुशी दे सकती है, लेकिन किसी पुरानी चीज़ को सँभाल लेना भी एक सुंदर हुनर है।
रचनात्मक श्रेय: NewsNationOnline की ‘आज के अल्फ़ाज़’ श्रृंखला के लिए लिखी गई मौलिक कविता। इसे किसी अन्य कवि के नाम से प्रस्तुत नहीं किया गया है।
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कविता की साहित्यिक विधा का सामान्य परिचय एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका पर उपलब्ध है। यह बाहरी संदर्भ इस मौलिक कविता का स्रोत नहीं है।
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