21 अक्टूबर 2026 | मौलिक हिंदी कविता
किताबों से भरा कमरा केवल अलमारियों और पन्नों का संग्रह नहीं होता। वहाँ कोई नई दुनिया खोजता है, कोई कठिन सवाल का उत्तर और कोई अपने सपनों की पहली दिशा। ‘आज के अल्फ़ाज़’ की आज की मौलिक हिंदी कविता पढ़ने की इस शांत लेकिन जीवंत दुनिया को समर्पित है।
आज की कविता: किताबों वाला कमरा
गली के मोड़ पर छोटा-सा एक कमरा था,
खिड़की में धूप और अलमारी में उजाला था।
लकड़ी की मेज़ पर खुली हुई किताब पड़ी,
उसके पन्नों में कितनी अनजानी राहें जुड़ीं।
कोई समंदर पढ़ता था, कोई तारों का पता,
कोई इतिहास से पूछता कल कैसा था भला।
एक बच्ची ने नक्शे पर दूर देश को छुआ,
अपनी छोटी-सी दुनिया से बड़ा सपना बुना।
किसी ने कठिन शब्द को धीरे से दोहराया,
फिर शब्दकोश खोलकर उसका अर्थ पाया।
न वहाँ शोर था, न कोई ऊँचा मंच सजा,
फिर भी हर मेज़ पर एक नया सवाल जगा।
शाम हुई तो सबने अपनी किताबें रख दीं,
पर मन में कुछ नई खिड़कियाँ खुली रह गईं।
कल फिर आएँगे, यह वादा कोई बोला नहीं,
पर उस कमरे की राह किसी से भूली नहीं।
कविता का भावार्थ
यह कविता सार्वजनिक पुस्तकालय जैसे एक साधारण स्थान में छिपी संभावनाओं को सामने लाती है। किताबें केवल जानकारी नहीं देतीं; वे प्रश्न पूछने, अलग अनुभवों को समझने और कल्पना को विस्तार देने का अवसर भी देती हैं। सीखने की शुरुआत अक्सर किसी बड़े साधन से नहीं, एक खुले पन्ने और जिज्ञासु मन से होती है।
आज का विचार
एक अच्छी किताब हर सवाल का जवाब नहीं देती; वह हमें बेहतर सवाल पूछना सिखाती है।
रचनात्मक श्रेय: NewsNationOnline की ‘आज के अल्फ़ाज़’ श्रृंखला के लिए तैयार मौलिक रचना। इसे किसी प्रसिद्ध कवि के नाम से प्रस्तुत नहीं किया गया है।
और पढ़ें
आज के अल्फ़ाज़ का साहित्यिक संग्रह, पिछली आठवडी बाजाराची गाणी और इंतज़ार का हुनर पढ़ें।
कविता की विधा और उसकी साहित्यिक परंपरा के सामान्य परिचय के लिए एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका देखें। यह बाहरी संदर्भ इस मौलिक कविता का स्रोत नहीं है।
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