कानून का स्पष्ट उद्देश्य
दीवानी मुकदमे में वर्षों बाद डिक्री मिलने पर भी उसका व्यावहारिक लाभ कम हो सकता है। संपत्ति, निर्माण परियोजना और व्यावसायिक अनुबंधों में यह समस्या गंभीर है। विशिष्ट अनुतोष (संशोधन) अधिनियम, 2018 द्वारा जोड़ी गई धारा 20C के अनुसार, प्रतिवादी को समन की तामील की तारीख से बारह महीनों के भीतर अधिनियम के अंतर्गत दायर वाद का निपटारा किया जाना चाहिए। लिखित कारण दर्ज करके कुल अधिकतम छह महीने की अतिरिक्त अवधि दी जा सकती है।
सिर्फ बुनियादी ढांचा विवादों तक सीमित नहीं
धारा 20A और 20B बुनियादी ढांचा परियोजनाओं तथा विशेष न्यायालयों से संबंधित हैं, लेकिन धारा 20C की भाषा व्यापक है और अधिनियम के अंतर्गत दायर वादों का उल्लेख करती है। 2018 के संशोधन ने विशिष्ट पालन की व्यवस्था को भी बदला, हालांकि धारा 11(2), 14 और 16 जैसी वैधानिक सीमाएं लागू रहती हैं।
देरी क्यों नुकसान पहुंचाती है
मुकदमे के दौरान संपत्ति की कीमत बदल सकती है, तीसरे पक्ष के हित पैदा हो सकते हैं, अनुमतियां समाप्त हो सकती हैं और गवाह या दस्तावेज जुटाना कठिन हो सकता है। इस कारण देर से मिला आदेश कानूनी रूप से सही होने के बावजूद मूल व्यावसायिक उद्देश्य पूरा नहीं कर पाता।
अनिवार्य भाषा और निष्पक्ष सुनवाई
धारा 20C में ‘shall be disposed of’ जैसे शब्द हैं। फिर भी समयसीमा समाप्त होने से मुकदमा स्वतः समाप्त या न्यायालय का अधिकार क्षेत्र खत्म हो जाता है, ऐसा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। वादी और प्रतिवादी दोनों को अपना पक्ष रखने, साक्ष्य प्रस्तुत करने और जिरह करने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
बार-बार तारीखें बढ़ना बड़ी चुनौती
जवाब दाखिल करने, दस्तावेज प्रस्तुत करने, जिरह या बहस के लिए अनावश्यक स्थगन समयसीमा को निष्प्रभावी बना सकते हैं। न्यायालयों को वास्तविक आवश्यकता और नियमित टालमटोल में अंतर करना होगा। छह महीने तक की अतिरिक्त अवधि देते समय ठोस कारण लिखित रूप में दर्ज होने चाहिए।
निचली अदालतों के लिए कार्ययोजना
प्रारंभ में अधिनियम की प्रयोज्यता जांचना, समन की तामील की तारीख दर्ज करना, बारह महीने की अंतिम लक्ष्य-तिथि तय करना, दलीलों एवं साक्ष्यों का कार्यक्रम बनाना, अनावश्यक स्थगन रोकना, आदेश-पत्र में समयसीमा का उल्लेख रखना तथा विस्तार के कारण लिखना—ये सात कदम कानून को प्रभावी बना सकते हैं।
अधिवक्ता महेश धन्नावत का प्रस्तावित वक्तव्य
वर्षों बाद मिला फैसला कानूनी अधिकार को मान्यता तो दे सकता है, लेकिन वास्तविक राहत का महत्व घट सकता है। अदालतों को समन की तामील की तारीख दर्ज कर बारह महीने का लक्ष्य तय करना चाहिए, अनावश्यक स्थगन रोकने चाहिए और अवधि बढ़ाने के कारण लिखित रूप में दर्ज करने चाहिए। शीघ्र न्याय के साथ निष्पक्ष सुनवाई भी आवश्यक है।
निष्कर्ष
धारा 20C का उद्देश्य जल्दबाजी में फैसला नहीं बल्कि अनुशासित, निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय है। संसद का प्रावधान तभी सार्थक होगा जब निचली अदालतें मुकदमे की शुरुआत से ही इसका पालन करने की योजना बनाएं।
Editorial note: Statement attributed to Adv. Mahesh Sitaram Dhannawat (B.Com., LL.M.) is a proposed quotation pending confirmation. This report is an explanatory analysis, not a judicial finding.
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