नई दिल्ली | विशेष कानूनी रिपोर्ट: क्या सर्वोच्च न्यायालय का कोई कार्यरत न्यायाधीश ऐसे विषय पर सार्वजनिक टिप्पणी कर सकता है जिस पर अदालत में सुनवाई जारी है? हैदराबाद के NALSAR विश्वविद्यालय में न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की SIR संबंधी टिप्पणियों को लेकर यह प्रश्न चर्चा में है।
7 अक्टूबर 2026 को Verdictum में प्रकाशित लेख में पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीश डॉ. कृष्ण एस. दीक्षित ने कहा कि लंबित मुकदमों पर ऐसी सार्वजनिक टिप्पणी से बचना चाहिए जो न्यायिक निष्पक्षता की धारणा या सुनवाई को प्रभावित कर सकती है। यह लेखक का मत है, न्यायमूर्ति भुइयां के विरुद्ध किसी अदालत का दोषनिर्णय नहीं।
SIR मामले का संदर्भ
विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) के संबंध में मतदाता सूची और पात्र मतदाताओं के संभावित नाम हटने जैसे सवाल उठाए गए हैं। इन मुद्दों की वैधता पर निर्णय अदालत को तथ्यों, संवैधानिक अधिकारों और कानून के आधार पर करना है। डॉ. दीक्षित का तर्क है कि दूसरे पीठ के समक्ष लंबित विवाद पर न्यायाधीश की टिप्पणी पूर्वाग्रह की आशंका पैदा कर सकती है।
भारत में न्यायाधीशों के आचरण के मानदंड
7 मई 1997 को सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण बैठक में स्वीकार किए गए ‘Restatement of Values of Judicial Life’ के अनुच्छेद (h) में न्यायाधीशों को राजनीतिक विषयों और लंबित या संभावित न्यायिक विवादों पर सार्वजनिक बहस से बचने का निर्देशात्मक मानदंड दिया गया है। वर्ष 2002 के Bangalore Principles of Judicial Conduct का अनुच्छेद 2.4 भी ऐसी टिप्पणी से बचने पर जोर देता है जिससे मामले के परिणाम या निष्पक्ष सुनवाई पर प्रभाव पड़ने की युक्तिसंगत आशंका हो।
लेख में In Re: P.C. Sen (1969) का उल्लेख है, जिसमें पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री की लंबित कार्यवाही संबंधी टिप्पणी को अवमानना माना गया था। हालांकि यह मामला न्यायाधीश के बजाय एक राजनीतिक पदाधिकारी से संबंधित था।
अंतरराष्ट्रीय न्यायिक उदाहरण
डॉ. दीक्षित ने ब्रिटेन के Roach v. Garvan (1742), King v. Clemen (1821), तथा Independent Publishing Co. (2004); अमेरिका के Toledo Newspaper (1918); ऑस्ट्रेलिया के Packer v. Peacock (1912); कनाडा के R. v. Bryan (1954); और सिंगापुर के Attorney General v. Pang Cheng Lian (1974) का हवाला दिया। न्यायाधीशों के सार्वजनिक आचरण पर कैलिफोर्निया के Broadman, मिसिसिपी के न्यायाधीश Carlos E. Moore और मेन के In the Matter of Benoit जैसे अनुशासनात्मक मामलों की भी चर्चा की गई है। लेख में The Queen v. Gray तथा ऑस्ट्रेलिया के R. v. Martinez का भी उल्लेख है। अलग-अलग देशों के कानून और अनुशासनात्मक प्रक्रियाएं एक जैसी नहीं हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्षता
कानूनी विषयों पर सामान्य शैक्षणिक चर्चा और लंबित मुकदमे के नतीजे पर प्रभाव डाल सकने वाली टिप्पणी में अंतर है। प्रत्येक सार्वजनिक आलोचना अवमानना नहीं होती। न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ न्यायिक संयम और पारदर्शिता भी आवश्यक हैं।
एडवोकेट महेश धन्नावत का कानूनी दृष्टिकोण
एडवोकेट महेश धन्नावत, बी.कॉम., एलएल.एम., जालना, का दृष्टिकोण है कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास केवल वास्तविक निष्पक्षता से नहीं, बल्कि निष्पक्षता स्पष्ट रूप से दिखाई देने से भी मजबूत होता है। न्यायाधीशों के आचरण पर सवाल उठें तो उनका परीक्षण संवैधानिक एवं संस्थागत प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि मीडिया में पहले से दोष तय करके। न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं। SIR मामले में मतदाताओं के अधिकारों का फैसला स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायिक परीक्षण से होना चाहिए।
निष्कर्ष: न्यायालय की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए न्यायिक संयम, उचित जवाबदेही और प्रत्येक पक्ष को निष्पक्ष सुनवाई मिलना अनिवार्य है।
आधार: डॉ. कृष्ण एस. दीक्षित का Verdictum में 7 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित विचार-लेख। लेख में व्यक्त विचार मूल लेखक के हैं। मूल लेख पढ़ें।
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