नई दिल्ली, 12 अक्टूबर 2026। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राजधानी में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिए गए कई लोगों ने दिल्ली पुलिस पर मारपीट, अपमानजनक व्यवहार और पानी, भोजन तथा चिकित्सा सहायता जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखने के गंभीर आरोप लगाए हैं। इन दावों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
हिरासत में क्या हुआ? प्रदर्शनकारियों के आरोप
द हिंदू की 12 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, हिरासत में लिए गए लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें पुलिस वाहनों में ले जाया गया, उनके फोन ले लिए गए और कुछ को अलग पुलिस परिसर में ले जाकर पीटा गया। उन्होंने पानी और अन्य आवश्यक सुविधाएं नहीं मिलने की शिकायत भी की। पुलिस के विरुद्ध लगाए गए ये आरोप जांच का विषय हैं।
आर्टिकल 14 की रिपोर्ट में 11 अक्टूबर को हिरासत में लिए गए लोगों के बयान प्रकाशित हुए हैं। नरेगा संघर्ष मोर्चा से जुड़े अर्जुन उन्नीकृष्णन ने आरोप लगाया कि पुलिस बस के भीतर उनके साथ मारपीट हुई। रिपोर्ट में नाबालिगों के साथ कथित हिंसा और भोजन, पानी तथा इलाज न मिलने के आरोप भी दर्ज हैं।
छात्र संगठनों ने भी उठाए सवाल
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के सदस्यों ने चोट के निशान दिखाते हुए पुलिस पर हिरासत में पिटाई का आरोप लगाया। कुछ महिला प्रदर्शनकारियों ने अनुचित व्यवहार की शिकायत भी की है। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच और संबंधित पक्षों की बात सामने आना आवश्यक है।
पत्रकारों की हिरासत और प्रेस की स्वतंत्रता
रॉयटर्स के अनुसार, प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों ने हिरासत, फोन जब्त करने और दुर्व्यवहार की शिकायतें की हैं। पत्रकार संगठनों ने इन घटनाओं पर आपत्ति जताई। द न्यूज़ मिनट ने कई पत्रकारों के प्रत्यक्ष अनुभव प्रकाशित किए हैं।
अदालत में पहले भी उठा था हिरासत में प्रताड़ना का मुद्दा
इससे पहले 6 अक्टूबर को दिल्ली की एक अदालत ने दो प्रदर्शनकारियों के हिरासत में कथित प्रताड़ना संबंधी आरोपों पर पुलिस से रिपोर्ट मांगी थी। अदालत ने 17 आरोपियों को जमानत देते हुए यह भी रेखांकित किया कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है, लेकिन ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर हमला स्वीकार्य नहीं है। संबंधित अदालती रिपोर्ट पढ़ें। यह एक पहले की अलग कार्यवाही थी; इसे 11 अक्टूबर के आरोपों पर न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
विरोध प्रदर्शन के पीछे क्या है विवाद?
चुनावी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर प्रदर्शनकारी चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव से पात्र मतदाता प्रभावित हुए हैं। चुनाव आयोग ने गड़बड़ी के आरोपों से इनकार किया है। रॉयटर्स की पृष्ठभूमि रिपोर्ट में विरोध प्रदर्शन और प्रशासनिक पाबंदियों का विवरण है।
पुलिस का पक्ष और जांच क्यों महत्वपूर्ण?
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर कथित हमले के एक अलग वायरल वीडियो के संबंध में चार लोगों को गिरफ्तार किया है। हालांकि, यह कार्रवाई पुलिस हिरासत में मारपीट के आरोपों की पुष्टि या खंडन नहीं करती। द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने वीडियो के आधार पर कानूनी कार्रवाई की।
हिरासत में कथित हिंसा की शिकायतों पर मेडिकल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, हिरासत रजिस्टर और स्वतंत्र गवाहों के बयान महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इस विशिष्ट मामले में दिल्ली पुलिस की विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध स्रोतों में पुष्ट नहीं हो सकी है। प्रतिक्रिया मिलने पर खबर अद्यतन की जानी चाहिए।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिरासत में अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 शांतिपूर्ण और बिना हथियार सभा करने की स्वतंत्रता देता है, जिस पर कानूनसम्मत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा करता है। हिरासत में व्यक्ति के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार और आवश्यक चिकित्सा सहायता के प्रश्न इसलिए गंभीर हैं।
अब मुख्य प्रश्न यह है कि कथित मारपीट की शिकायतों की निष्पक्ष जांच होगी या नहीं, हिरासत से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएंगे या नहीं और जिम्मेदारी कैसे तय होगी। आरोपों की पुष्टि से पहले किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा।
यह भी पढ़ें: दिल्ली प्रदर्शन और चुनाव आयोग विवाद
- महिला प्रदर्शनकारियों से कथित बदसलूकी के आरोप और जांच की मांग
- पत्रकारों की हिरासत और प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल
- छात्र संगठनों की भागीदारी और हिरासत पर विवाद
- शांतिपूर्ण विरोध का संवैधानिक अधिकार क्या कहता है?
- एसआईआर और मतदाता सूची विवाद की पूरी पृष्ठभूमि
मुख्य स्रोत: द हिंदू की मूल रिपोर्ट।
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