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इस्लाम में बेगुनाह का कत्ल बहुत बड़ा गुनाह, एक इंसान की जान लेना पूरी इंसानियत की हत्या के बराबर

इस्लाम में बेगुनाह की हत्या की मनाही पर मुफ्ती गुलाम नबी अमजदी का विशेष लेख — सांकेतिक फीचर्ड ग्राफिक
कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

विशेष आलेख | लेखक: मुफ्ती गुलाम नबी अमजदी
खतीब व इमाम, हसनिया मस्जिद, बुरहान नगर

आज हमारे समाज में छोटी-छोटी बातों पर झगड़े, मारपीट और कत्ल की घटनाएं चिंता का विषय बनती जा रही हैं। कहीं पैसों के लेन-देन को लेकर किसी की जान ले ली जाती है, तो कहीं जमीन के विवाद में खून बहाया जाता है। कभी पुरानी दुश्मनी, तो कभी नशे और गुस्से में इंसान ऐसा कदम उठा लेता है, जिससे कई परिवारों की जिंदगी बर्बाद हो जाती है।

अखबारों, टेलीविजन और सोशल मीडिया पर आए दिन ऐसी खबरें सामने आती हैं। कभी कर्ज को लेकर हत्या होती है, तो कभी मामूली कहासुनी इतनी बढ़ जाती है कि लोग एक-दूसरे की जान लेने पर उतर आते हैं। आखिर हमारे समाज को क्या हो गया है? क्या इंसान की जान इतनी सस्ती हो गई है कि थोड़े से पैसों, जमीन या आपसी रंजिश के लिए किसी को मौत के घाट उतार दिया जाए?

हमें याद रखना चाहिए कि इस्लाम अमन, मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैगाम देता है। किसी बेगुनाह की जान लेना इस्लाम में बहुत बड़ा गुनाह है। कुरआन और हदीस में इसकी सख्त मनाही की गई है।

एक इंसान का कत्ल पूरी इंसानियत का कत्ल

अल्लाह तआला कुरआन शरीफ की सूरह अल-माइदा, आयत 32 में फरमाता है:

“मन कतला नफ्सन बिगैरि नफ्सिन औ फसादिन फिल अर्जि फकअन्नमा कतलन्नासा जमीअन।”

इसका भावार्थ है कि जिसने किसी बेगुनाह इंसान की जान ली, उसने मानो पूरी इंसानियत का कत्ल कर दिया। और जिसने किसी एक इंसान की जान बचाई, उसने मानो पूरी इंसानियत की जान बचा ली।

इस आयत में बनी इस्राईल के बारे में हुक्म बयान किया गया है, लेकिन इसमें हमारे लिए भी बड़ी सीख है। अल्लाह तआला ने इंसान की जान को बहुत कीमती बताया है। अगर कोई किसी को डूबने से बचाता है, आग से निकालता है, भूख से मरने से बचाता है या किसी की हत्या होने से रोकता है, तो वह इंसानियत का बहुत बड़ा काम करता है। इसके उलट, किसी बेगुनाह की जान लेने वाला केवल एक व्यक्ति को नहीं मारता, बल्कि उसके परिवार की खुशियां और उम्मीदें भी छीन लेता है।

कयामत के दिन सबसे पहले खून-खराबे के मामलों का फैसला

हमारे प्यारे नबी हजरत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:

“अव्वलु मा युक्जा बैनन्नासि यौमल कियामति फिद्दिमा।”

यानी कयामत के दिन लोगों के बीच सबसे पहले खून-खराबे के मामलों का फैसला किया जाएगा। (सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम)

इस हदीस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अल्लाह के नजदीक इंसानी जान की कितनी अहमियत है। दुनिया में कोई व्यक्ति अपराध करके कानून की पकड़ से बच भी जाए, तो उसे यह नहीं समझना चाहिए कि उससे कभी सवाल नहीं होगा। आखिरत में हर इंसान को अपने किए का हिसाब देना होगा।

जानबूझकर कत्ल करने वालों के लिए सख्त चेतावनी

कुरआन शरीफ की सूरह अन-निसा, आयत 93 में अल्लाह तआला ने जानबूझकर किसी मोमिन का कत्ल करने वाले के लिए सख्त चेतावनी दी है। इस आयत का अर्थ है कि जो व्यक्ति किसी मोमिन की जानबूझकर हत्या करता है, उसके लिए जहन्नम, अल्लाह की नाराजगी और बड़े अजाब की चेतावनी है।

हजरत अनस रजियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नाहक कत्ल को बड़े गुनाहों में शामिल बताया है। (सहीह बुखारी)

इसलिए किसी भी इंसान को गुस्से, बदले या दुश्मनी में ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जिससे किसी की जान चली जाए। किसी की जिंदगी खत्म कर देना किसी समस्या का हल नहीं हो सकता।

कत्ल करना ही नहीं, किसी की जान लेने की नीयत रखना भी गलत

हजरत अबू बकरा रजियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब दो मुसलमान एक-दूसरे को मारने के इरादे से तलवार लेकर लड़ते हैं, तो कातिल और मरने वाले, दोनों के लिए जहन्नम की चेतावनी है। इस पर पूछा गया कि कातिल के बारे में तो समझ में आता है, लेकिन मरने वाले को सजा क्यों? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि वह भी अपने साथी का कत्ल करने का इरादा रखता था। (सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम)

इस हदीस से हमें यह सीख मिलती है कि किसी की जान लेने के इरादे से हथियार उठाना भी बहुत गंभीर बात है। इंसान को अपने गुस्से और गलत इरादों पर काबू रखना चाहिए।

कातिल की हिमायत करने से पहले पीड़ित परिवार का दर्द समझिए

आज समाज में एक और गलत बात देखने को मिलती है। जब कोई व्यक्ति हत्या जैसे गंभीर अपराध में शामिल होता है, तो कुछ लोग उसके गलत काम को छिपाने या उसे बचाने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी तो दोषी ठहराए गए अपराधियों का फूल-मालाओं से स्वागत तक किया जाता है, जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा काम किया हो।

जरा उस मां के बारे में सोचिए, जिसका जवान बेटा कत्ल कर दिया गया हो। उस पिता पर क्या गुजरती होगी, जिसके बुढ़ापे का सहारा छिन गया? उस पत्नी और बच्चों की क्या हालत होती होगी, जिनके घर का कमाने वाला हमेशा के लिए चला गया? क्या हम कभी उनके दर्द को समझने की कोशिश करते हैं?

इस्लाम किसी जालिम का साथ देने की इजाजत नहीं देता। किसी आरोपी को कानून के मुताबिक अपना बचाव करने का अधिकार जरूर है, लेकिन अपराध को सही ठहराना, सबूत छिपाना या पीड़ित के साथ नाइंसाफी करना गलत है।

हजरत अबू हुरैरा रजियल्लाहु अन्हु से मंसूब एक रिवायत में भी किसी मोमिन के नाहक कत्ल में मदद करने वाले के लिए सख्त चेतावनी बयान हुई है। (सुनन इब्ने माजा; इस रिवायत की प्रामाणिकता के बारे में विद्वानों में मतभेद है।) हमें हमेशा सच, इंसाफ और मजलूम का साथ देना चाहिए।

आखिर कब तक छोटी-छोटी बातों पर बहता रहेगा खून?

आज कहीं जमीन को लेकर भाई-भाई का दुश्मन बन जाता है, तो कहीं पैसों के लिए दोस्त ही दोस्त की जान ले लेता है। नशा, गुटबाजी, पुरानी रंजिश और बदले की भावना कई परिवारों की बर्बादी का कारण बन रही है। कभी किसी गरीब की जमीन हड़पने के लिए उसकी हत्या कर दी जाती है, तो कभी मामूली झगड़े में हथियार निकाल लिए जाते हैं।

आखिर यह सब कब तक चलता रहेगा? क्या झगड़े का हल सिर्फ मारपीट है? क्या किसी की जान लेने से जमीन, पैसा या इज्जत वापस मिल जाती है? नहीं। किसी का कत्ल करने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि नई दुश्मनी, दुख और कई परिवारों की बर्बादी शुरू हो जाती है। हमें समझना होगा कि किसी की जान लेना बहादुरी नहीं, बल्कि एक गंभीर अपराध और बड़ा गुनाह है।

बच्चों और नौजवानों को सही रास्ता दिखाना जरूरी

समाज में बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए केवल पुलिस और प्रशासन के भरोसे बैठना काफी नहीं है। हम सबको अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। मां-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों की परवरिश पर ध्यान दें। उन्हें अच्छी तालीम दें, गलत संगत से बचाएं और नशे की आदत से दूर रखें।

नौजवानों को समझना चाहिए कि असली बहादुरी किसी से लड़ने या हथियार उठाने में नहीं, बल्कि अपने गुस्से पर काबू रखने में है। बड़ों की इज्जत करना, छोटों से प्यार से पेश आना, पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते रखना और मामूली बातों पर झगड़ा न करना अच्छी जिंदगी की पहचान है।

अगर किसी से विवाद हो जाए, तो उसे बातचीत से सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर परिवार के समझदार लोगों या कानून की मदद लेनी चाहिए, लेकिन हिंसा का रास्ता कभी नहीं अपनाना चाहिए। धार्मिक विद्वानों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और समाज के जिम्मेदार लोगों को भी नौजवानों की सही रहनुमाई के लिए आगे आना होगा।

अमन और भाईचारे से ही बनेगा बेहतर समाज

मेरे अजीज भाइयों और बुजुर्गों! हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि इंसान की जान अल्लाह की दी हुई बहुत बड़ी नेमत है। किसी बेगुनाह की जान लेना, किसी पर जुल्म करना या जुल्म करने वालों की गलत तरीके से मदद करना इस्लाम की शिक्षाओं के खिलाफ है।

आज जरूरत इस बात की है कि हम अपने बच्चों को मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे की तालीम दें। समाज में नफरत फैलाने के बजाय लोगों को जोड़ने का काम करें। अगर हम अपने गुस्से पर काबू रखना सीख जाएं, दूसरों के हक का ख्याल रखें और अल्लाह तथा उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई शिक्षाओं पर अमल करें, तो समाज को कई बुराइयों से बचाया जा सकता है।

याद रखिए, किसी की जान लेना बहादुरी नहीं है। असली बहादुरी किसी की जान बचाने, जुल्म रोकने और लोगों के बीच अमन कायम करने में है। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि न किसी पर जुल्म करेंगे, न किसी बेगुनाह के साथ नाइंसाफी होने देंगे और न ही समाज में हिंसा फैलाने वालों का समर्थन करेंगे।

अल्लाह तआला हम सभी को नाहक कत्ल, जुल्म, नफरत और आपसी दुश्मनी से बचाए। हमारे नौजवानों को सही रास्ते पर चलने की तौफीक दे और हमारे समाज में अमन, मोहब्बत और भाईचारा कायम रखे। आमीन।


मुफ्ती गुलाम नबी अमजदी का फोटो
लेखक: मुफ्ती गुलाम नबी अमजदी

लेखक परिचय: मुफ्ती गुलाम नबी अमजदी, खतीब व इमाम, हसनिया मस्जिद, बुरहान नगर। यह लेख इस्लामी शिक्षाओं के आलोक में इंसानी जान की अहमियत, हिंसा की रोकथाम और सामाजिक जिम्मेदारी पर लेखक के विचार प्रस्तुत करता है।

संबंधित सामग्री: अमन और भाईचारे पर लेख | सामाजिक हिंसा और जागरूकता से जुड़ी खबरें


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Imran Siddiqui

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