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२८ अक्टूबर का इतिहास: स्वतंत्रता की प्रतिमा, ग्रीस का प्रतिरोध और क्यूबा संकट

अक्टूबर १९६२ में व्हाइट हाउस में क्यूबा मिसाइल संकट पर चर्चा करते राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी और सलाहकार
कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

२८ अक्टूबर की तारीख विश्व इतिहास की कई ऐसी घटनाओं को जोड़ती है, जिनसे आज की राजनीति और समाज को समझने में मदद मिलती है। वर्ष १८८६ में अमेरिका के न्यूयॉर्क बंदरगाह पर स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी का लोकार्पण हुआ। वर्ष १९२२ में इटली में फासीवादी समर्थकों की रोम की ओर बढ़त ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को संकट में डाल दिया। वर्ष १९४० में ग्रीस ने इटली की मांग ठुकराई और युद्ध का सामना किया। वहीं १९६२ में क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान परमाणु टकराव टालने की दिशा में निर्णायक घोषणा हुई। इन घटनाओं का महत्व केवल तारीखों में नहीं, उनके पीछे मौजूद फैसलों और परिणामों में है।

१८८६: आजादी की प्रतिमा का ऐतिहासिक लोकार्पण

२८ अक्टूबर १८८६ को अमेरिकी राष्ट्रपति ग्रोवर क्लीवलैंड ने न्यूयॉर्क बंदरगाह के एक द्वीप पर स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी का औपचारिक उद्घाटन किया। उस समय द्वीप का नाम बेडलोज आइलैंड था। फ्रांस के लोगों की ओर से अमेरिका को दी गई इस विशाल प्रतिमा का आधिकारिक नाम स्वतंत्रता दुनिया को रोशन करती है, ऐसा अर्थ देने वाला था। यह दोनों देशों की मित्रता और स्वतंत्रता के आदर्श का प्रतीक बनी।

फ्रांसीसी मूर्तिकार फ्रेडरिक ऑगस्ट बार्थोल्डी ने इसकी रूपरेखा तैयार की। धातु की विशाल संरचना को सहारा देने के लिए इंजीनियरिंग का जटिल काम हुआ, जिसमें गुस्ताव एफिल से जुड़ी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रतिमा का निर्माण फ्रांस में हुआ और फिर उसके हिस्से जहाज से अमेरिका भेजे गए। वहां उन्हें जोड़कर ऊंचे आधार पर स्थापित किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में तकनीकी कौशल के साथ आर्थिक सहयोग और जनभागीदारी की भी जरूरत पड़ी।

अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान सेवा के दस्तावेज बताते हैं कि उद्घाटन के दिन बारिश और धुंध के बावजूद बड़ी संख्या में लोग जश्न में शामिल हुए। शहर में जुलूस निकला और समुद्र में जहाजों ने समारोह की शोभा बढ़ाई। लेकिन उस दौर के अमेरिका की हकीकत को भी याद रखना जरूरी है। महिलाओं को पूरे देश में मतदान का अधिकार नहीं मिला था और नस्ली भेदभाव कायम था। महिला मताधिकार की समर्थक कुछ कार्यकर्ताओं ने आधिकारिक समारोह में महिलाओं को सीमित प्रवेश मिलने का विरोध किया था।

बाद के वर्षों में प्रतिमा का संबंध प्रवासियों की उम्मीदों से और गहरा हुआ। पास के एलिस आइलैंड पर १८९२ से प्रवासियों की जांच और प्रवेश का बड़ा केंद्र संचालित हुआ। प्रतिमा के आधार पर एमा लाजरस की कविता की पट्टिका १९०३ में लगाई गई। इस तरह स्वतंत्रता की प्रतिमा का अर्थ समय के साथ बदलता और विस्तृत होता गया। आज भी यह सवाल उठाती है कि आजादी का आदर्श समाज के हर व्यक्ति तक समान रूप से पहुंचा या नहीं।

१९२२: रोम की ओर फासीवादी बढ़त और लोकतंत्र का संकट

२७ और २८ अक्टूबर १९२२ की रात इटली में बेनितो मुसोलिनी के फासीवादी समर्थक रोम की ओर बढ़े। काली कमीज पहनने वाले इन संगठित समूहों ने हिंसा और दबाव के जरिए सत्ता परिवर्तन की कोशिश की। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इटली आर्थिक परेशानियों, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक तनाव से गुजर रहा था। फासीवादी आंदोलन ने इन परिस्थितियों का इस्तेमाल अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए किया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री लुइजी फाक्ता ने आपात कदम उठाने की कोशिश की, लेकिन राजा विक्टर इमैनुएल तृतीय ने सैन्य शासन संबंधी आदेश को मंजूरी नहीं दी। इसके बाद राजा ने मुसोलिनी को सरकार बनाने का अवसर दिया। यह कहना गलत होगा कि मुसोलिनी ने केवल २८ अक्टूबर को राजधानी में प्रवेश करके सत्ता हासिल कर ली थी। सत्ता हस्तांतरण कई दिनों की राजनीतिक प्रक्रिया और दबाव का परिणाम था।

अमेरिकी होलोकॉस्ट स्मारक संग्रहालय के अनुसार मुसोलिनी की शुरुआती गठबंधन सरकार बाद में तानाशाही व्यवस्था में बदल गई। वर्ष १९२५ तक संसदीय लोकतंत्र को व्यवस्थित रूप से कमजोर कर दिया गया। इस घटना से एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है। लोकतांत्रिक संस्थाएं केवल चुनाव कराने से सुरक्षित नहीं रहतीं; हिंसा और धमकी के सामने सत्ता प्रतिष्ठानों के फैसले भी उनका भविष्य तय करते हैं।

१९४०: ग्रीस का इनकार और इटली का हमला

२८ अक्टूबर १९४० की सुबह फासीवादी इटली ने ग्रीस के सामने मांग रखी कि उसकी सेना को देश के कुछ सामरिक स्थानों पर कब्जा करने दिया जाए। इटली की सेना उस समय अल्बानिया में मौजूद थी। ग्रीस ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और इसके बाद सीमा पर लड़ाई शुरू हो गई। उसी दिन भेजे गए अमेरिकी राजनयिक संदेशों में अल्टीमेटम, सैन्य तैयारियों और हमले का उल्लेख मिलता है।

ग्रीस में इस दिन को ओही दिवस कहा जाता है। ग्रीक भाषा में इसका अर्थ है नहीं। लोकप्रिय स्मृति में यह एक शब्द विदेशी दबाव को ठुकराने के साहस का प्रतीक बन गया। हालांकि ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि ग्रीस के तत्कालीन शासक इओआनिस मेटाक्सास ने राजनयिक बातचीत में फ्रांसीसी भाषा में उत्तर दिया था। इसलिए लोकप्रिय नारे और बातचीत में कहे गए वास्तविक शब्दों के बीच अंतर समझना चाहिए।

ग्रीस की सेना ने शुरुआत में इटली के आक्रमण को रोका और फिर जवाबी कार्रवाई करते हुए अल्बानिया की ओर बढ़ी। इससे मुसोलिनी की युद्ध योजना को गंभीर झटका लगा। लेकिन ग्रीस की मुश्किलें यहीं समाप्त नहीं हुईं। अप्रैल १९४१ में नाजी जर्मनी ने हमला किया और देश पर कब्जा हो गया। उसके बाद नागरिकों को भारी कष्ट सहने पड़े। यहूदी समुदायों पर अत्याचार हुए और बड़ी संख्या में लोगों की हत्या की गई।

इस इतिहास को समझते समय एक और बात ध्यान देने योग्य है। विदेशी आक्रमण का विरोध करने वाले मेटाक्सास स्वयं लोकतांत्रिक नेता नहीं थे, बल्कि एक सत्तावादी शासन चलाते थे। इसलिए ग्रीस के लोगों की बहादुरी को सम्मान देना और उस समय की घरेलू राजनीति का निष्पक्ष आकलन करना, दोनों जरूरी हैं।

१९६२: क्यूबा मिसाइल संकट में समझौते की राह

२८ अक्टूबर १९६२ को सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने घोषणा की कि क्यूबा में तैनात सोवियत आक्रामक मिसाइलें हटाई जाएंगी। इससे अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु युद्ध की आशंका कम हुई। कुछ दिन पहले अमेरिकी टोही तस्वीरों में क्यूबा के मिसाइल ठिकानों का पता चला था। राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी ने २२ अक्टूबर को देश को संबोधित कर समुद्री रोक लगाने की घोषणा की थी।

अगले दिनों में दोनों महाशक्तियों की सेनाएं सतर्क थीं और दुनिया को बड़े युद्ध का डर था। केनेडी राष्ट्रपति पुस्तकालय के अभिलेखों के अनुसार २८ अक्टूबर की घोषणा ने संकट के सबसे खतरनाक तेरह दिनों को समाप्त करने की दिशा दिखाई। सोवियत मिसाइलों की वापसी के बदले अमेरिका ने क्यूबा पर हमला नहीं करने का सार्वजनिक आश्वासन दिया। तुर्किये में अमेरिकी मिसाइलों की बाद में वापसी से जुड़ी एक अलग, उस समय गोपनीय समझ भी बनी।

यह समाधान किसी एक पक्ष की पूरी जीत या दूसरे की पूरी हार नहीं था। इसमें दबाव, बातचीत, सुरक्षा संबंधी चिंताएं और समझौता सभी शामिल थे। अमेरिकी अधिकारियों ने घोषणा का स्वागत किया, लेकिन मिसाइलों की वास्तविक वापसी और निगरानी को लेकर सावधानी बनाए रखी। क्यूबा की अपनी सुरक्षा संबंधी आशंकाएं भी थीं, हालांकि प्रमुख बातचीत वाशिंगटन और मॉस्को के बीच हुई।

क्यूबा संकट ने दिखाया कि गलत आकलन, अधूरी सूचना या जल्दबाजी दुनिया को कितने बड़े खतरे में डाल सकती है। इसके बाद परमाणु शक्तियों के बीच बेहतर संपर्क और हथियार नियंत्रण की जरूरत पर जोर बढ़ा। यह घटना आज भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में संयम और संवाद के महत्व का बड़ा उदाहरण मानी जाती है।

आज की तारीख हमें क्या सिखाती है?

स्वतंत्रता की प्रतिमा अधिकारों के आदर्श और उनकी अधूरी यात्रा की याद दिलाती है। रोम की फासीवादी बढ़त चेतावनी देती है कि लोकतंत्र को हिंसक दबाव से बचाना पड़ता है। ग्रीस का प्रतिरोध बताता है कि छोटा देश भी आक्रमण का सामना कर सकता है, जबकि क्यूबा संकट समझाता है कि कभी-कभी सबसे बड़ा साहस युद्ध टालने में होता है। इतिहास की घटनाओं को उनके पूरे संदर्भ में पढ़ना ही इन वर्षगांठों को सार्थक बनाता है।

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Imran Siddiqui
Imran Siddiqui is a senior journalist and editor of NewsNationOnline, with over 17 years of experience covering news, politics, education and social issues in Maharashtra.

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