₹25 लाख मुआवज़े पर रोक! धर्मांतरण के बाद दो बहनों को कथित रूप से बंद रखने के मामले में इलाहाबाद HC का अहम आदेश
प्रयागराज: हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने के बाद दो वयस्क बहनों को कथित तौर पर उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में बंद रखने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ मुआवज़ा देने के निर्देश पर रोक लगा दी है। हालांकि, बहनों को उनकी इच्छा के विरुद्ध पिता की हिरासत से मुक्त करने के एकल न्यायाधीश के आदेश में खंडपीठ ने हस्तक्षेप करने से इनकार किया।
मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की पीठ ने मुआवज़े के सीमित मुद्दे पर नोटिस जारी किया। पीठ ने विचार किया कि क्या राज्य सरकार को इस पहलू पर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया था। यह अंतरिम रोक है, मुआवज़े की जिम्मेदारी पर अंतिम फैसला नहीं।
एकल पीठ ने दिया था ₹25 लाख का निर्देश
रिपोर्ट के अनुसार, 6 अगस्त 2026 को एकल पीठ ने दिया भाटिया उर्फ ज़ोया दिया भाटिया (20) और अंशू भाटिया उर्फ अमीना अंशू भाटिया (35) के मामले में उनके पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से ₹25 लाख मुआवज़ा देने का निर्देश दिया था। राशि दोनों के बीच बराबर बांटने की बात कही गई थी।
बहनों ने कहा—धर्मांतरण अपनी इच्छा से किया
दोनों महिलाओं ने अदालत को बताया कि उन्होंने अपनी आस्था और इच्छा से इस्लाम अपनाया। रिपोर्ट के मुताबिक, अंशू ने 2020 में और दिया ने 2021 में धर्मांतरण किया। उन्होंने दबाव, धोखाधड़ी, जबरदस्ती या लालच के आरोपों से इनकार किया और दावा किया कि इसके बाद पिता ने उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में बंद रखा।
सरकार की दलील, बहनों की स्वतंत्रता का आदेश बरकरार
राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने मुआवज़े के मुद्दे पर सरकार को उचित अवसर नहीं दिए जाने की दलील दी। बहनों के वकील कैफ हसन ने कथित हिरासत में राज्य अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप लगाया और व्हाट्सऐप चैट का हवाला दिया, ऐसा रिपोर्ट में कहा गया है।
खंडपीठ ने बहनों को उनकी इच्छा के विरुद्ध पिता की हिरासत से मुक्त करने के निर्देश को नहीं बदला। फिलहाल रोक केवल राज्य सरकार के खिलाफ मुआवज़े के निर्देश पर है। अंतिम निर्णय आगे की सुनवाई के बाद होगा।
अॅड. महेश धन्नावत की प्रतिक्रिया
“इस मामले में वयस्क व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मुआवज़े का निर्धारण करने की न्यायिक प्रक्रिया दो अलग-अलग मुद्दे हैं। बहनों की रिहाई के आदेश को बरकरार रखकर हाईकोर्ट ने उनकी स्वतंत्रता को महत्व दिया है। मुआवज़े के मुद्दे पर राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला था या नहीं, इस पर अलग से विचार होगा। इसलिए इस रोक को अंतिम फैसला नहीं समझना चाहिए। अगली सुनवाई के बाद ही स्थिति और स्पष्ट होगी।”
— अधिवक्ता महेश धन्नावत
स्रोत: 9 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित LiveLaw की रिपोर्ट पर आधारित सारांश।
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