अधिवक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक अधिवक्ता के आचरण पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए रजिस्ट्रार जनरल को उनके विरुद्ध आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति एच. पी. संदेश की एकल पीठ ने कहा कि वकील का दायित्व अदालत की सहायता करना है, न कि अपनी पसंद का आदेश पारित करने पर जोर देना।
मामला क्या था?
याचिकाकर्ता ने भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120B, 200, 404, 419, 420, 421, 423, 424, 426, 464, 467 और 468 के तहत दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग की थी। न्यायालय ने शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया था, लेकिन बाद में बताया गया कि शिकायतकर्ता का 3 मई 2021 को निधन हो चुका है। मृत्यु प्रमाणपत्र भी रिकॉर्ड पर रखा गया।
कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाने पर विवाद
अदालत ने शिकायतकर्ता के निधन के बाद आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के लिए समय दिया। रिपोर्ट किए गए आदेश के अनुसार याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कई बार समय मांगा, लेकिन बाद में कहा कि मृत शिकायतकर्ता के कानूनी प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर लाने के लिए आवेदन आवश्यक नहीं है। पीठ ने वारंट मामले में मृत शिकायतकर्ता के कानूनी वारिसों के अभियोजन जारी रखने के अधिकार से जुड़े न्यायिक सिद्धांतों पर विचार किया।
अदालत ने मेरिट पर सुनवाई क्यों नहीं की?
पीठ ने कहा कि कानूनी वारिसों को सुनवाई का अवसर दिए बिना मामले के गुण-दोष पर निर्णय लेना उचित नहीं होगा। न्यायालय ने संबंधित प्रक्रिया का पालन न किए जाने तथा अदालत के समक्ष असंतोष व्यक्त करने के कथित अभद्र तरीके की आलोचना की।
अवमानना कार्यवाही और दोषसिद्धि में अंतर
उच्च न्यायालय ने एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज करते हुए रजिस्ट्रार जनरल को अधिवक्ता के विरुद्ध अवमानना कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया। यह निर्देश अपने आप में अवमानना के अपराध में अंतिम दोषसिद्धि या सजा नहीं है; अलग प्रक्रिया में कानून के अनुसार सुनवाई होती है।
अधिवक्ताओं और पक्षकारों के लिए सबक
फैसला बताता है कि प्रभावी पैरवी के साथ न्यायालय के प्रति सम्मान, विधिक प्रक्रिया और प्रभावित पक्षों की सुनवाई भी जरूरी है। हालांकि अधिवक्ताओं को कानून के आधार पर असहमति व्यक्त करने, आपत्ति उठाने और उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने का अधिकार बना रहता है।
अधिवक्ता महेश धन्नावत की प्रतिक्रिया
इस निर्णय के व्यापक महत्व पर टिप्पणी करते हुए जालना के अधिवक्ता महेश सीताराम धन्नावत ने कहा कि अधिवक्ताओं का पेशेवर दायित्व तथ्यों, कानून और निष्पक्ष प्रक्रिया के आधार पर न्यायालय की सहायता करना है। प्रभावी पैरवी और सम्मानपूर्वक असहमति उचित है, लेकिन किसी विशेष आदेश के लिए दबाव डालना या प्रभावित पक्षों के अधिकारों की अनदेखी करना उचित नहीं। न्यायालयीन शिष्टाचार तथा प्रक्रियात्मक जिम्मेदारियों के प्रशिक्षण पर भी जोर दिया जाना चाहिए।
Case: V.M. Kumarswamy v. State of Karnataka, 2026:KHC:59045. Source: Verdictum, 21 October 2026. Editorial commentary attributed to Adv. Dhannawat is a proposed statement pending his verification.
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