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जालना में लघु उद्योग भारती का दीपावली स्नेह मिलन — हास्य कवि सम्मेलन में गूँजे ठहाके और संवेदनाएँ

जालना : “कितनी पायल बजती थी जब डफली पकड़ा करते थे,
आँखों वाले काँटे से हम मछली पकड़ा करते थे,
फूलों जैसे हाथों से हम तितली पकड़ा करते थे…”

इन पंक्तियों के साथ जब हास्य कवि धर्मेंद्र सोलंकी (भोपाल) ने मंच संभाला, तो सभागार ठहाकों और भावनाओं से गूंज उठा। लघु उद्योग भारती, जालना की ओर से वृंदावन लॉन्स में गुरुवार (30 अक्टूबर) की शाम आयोजित दीपावली स्नेह मिलन और हास्य कवि सम्मेलन में कवियों ने प्रेम, मातृत्व, सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रभक्ति से जुड़ी शानदार रचनाओं से उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम का उद्घाटन जिला पुलिस अधीक्षक अजय कुमार बंसल के हस्ते हुआ। इस अवसर पर लघु उद्योग भारती, जालना के अध्यक्ष पंकज कासलीवाल, सचिव संजय अग्रवाल (लाला), कोषाध्यक्ष पियूष मुंदड़ा, मराठवाड़ा कार्याध्यक्ष राजेश कामड, उपाध्यक्ष संजय देशपांडे तथा प्रमुख उद्योगपति सुनील भाई रायठठा, शिवरतन मुंदड़ा, सतीश भक्कड, सुशील पाण्डेय, गणेश बियाणी, दीपक सोमानी, अविनाश देशपांडे समेत अनेक गणमान्य उपस्थित थे।


कवियों की शानदार प्रस्तुति

राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित कवि — सुमित्रा सरल (रतलाम), चेतन चर्चित (दिल्ली), वीरेंद्र विद्रोही (ललितपुर), पार्थ नवीन (प्रतापगढ़) और धर्मेंद्र सोलंकी (भोपाल) — ने अपने अनोखे अंदाज़ में कविताओं की प्रस्तुति दी।

सुमित्रा सरल ने मधुर गीतों से शाम की शुरुआत की, जबकि चेतन चर्चित ने हास्य और व्यंग्य से श्रोताओं को खूब हँसाया और कहा —
“जीवन में लंबाई नहीं, गहराई होनी चाहिए!”

उन्होंने “बेटी का घर बसाया खुद का घर जलाकर” जैसी मार्मिक रचनाओं से समाज में बेटी के संघर्ष को उजागर किया।

वीरेंद्र विद्रोही ने मातृशक्ति, भ्रूणहत्या और दहेज प्रथा पर करारा व्यंग्य करते हुए कहा —
“हलवा पुरी तो बेटे के खातीर बने, बासी रोटी चबाती रही बेटियाँ…”

उन्होंने अपनी कविताओं में मातृत्व और सैनिकों के साहस को सलाम किया। वहीं पार्थ नवीन ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में राजनीति, रिश्तों और जीवन की वास्तविकताओं पर व्यंग्य करते हुए कहा —
“कविता से तालियाँ, जीजाजी से सालीयाँ मिलाता चला जाऊँगा!”

उन्होंने सकारात्मकता का संदेश देते हुए कहा कि “जीवन में मुस्कान बनाए रखना ही सबसे बड़ा कवि होना है।”

सुमित्रा सरल ने आगे अपनी ग़ज़लों “घरवाली खारी है, बाहरवाली प्यारी है” के ज़रिए प्रेम और हास्य का सुंदर संगम प्रस्तुत किया।

अंत में भोपाल के धर्मेंद्र सोलंकी, जो पेशे से अभियंता हैं, ने अपनी हास्यपूर्ण कविताओं और संवादों से माहौल को जीवंत कर दिया। उनकी लोकप्रिय रचना —
“मम्मी बोली, सब अच्छा हो जायेगा…”
पर श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया।


हास्य के साथ सामाजिक संदेश

करीब ढाई घंटे तक चले इस कवि सम्मेलन में हास्य, संवेदनशीलता और सामाजिक संदेशों का सुंदर संगम देखने को मिला। कार्यक्रम में उद्योगपति, महिलाएँ, साहित्यप्रेमी और लघु उद्योग भारती के सदस्य बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का समापन तालियों की गड़गड़ाहट और दीपावली की शुभकामनाओं के साथ हुआ।


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