Controversy deepens over amendment in Wakf Bill: Arshad Madani’s arguments before JPC
नई दिल्ली: वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 को लेकर देश में बहस और विरोध तेज़ हो गया है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कराते हुए विधेयक को मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा आघात बताया। उनका कहना है कि यह विधेयक संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और वक्फ संपत्तियों की स्वायत्तता को खतरे में डालता है।
अरशद मदनी की प्रमुख दलीलें:
1. कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों पर अधिकार देने का विरोध:
मौलाना मदनी ने कहा कि संशोधित विधेयक में वक्फ संपत्तियों के सर्वेक्षण और विवादों का अधिकार कलेक्टर को देने का प्रावधान है।
“यह वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकारों को सीमित करता है और राजनीतिक हस्तक्षेप का मार्ग खोलता है,” – मौलाना मदनी।
2. गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति पर आपत्ति:
विधेयक में वक्फ बोर्डों और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान है। मदनी ने इसे धार्मिक स्वायत्तता के खिलाफ बताया और कहा कि यह मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप है।
3. संविधानिक अधिकारों का हनन:
मौलाना ने जोर देकर कहा कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
विपक्षी दलों का विरोध
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने भी इस विधेयक को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे “मुस्लिम विरोधी और असंवैधानिक” करार दिया।
“यह विधेयक धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमला है,” – कांग्रेस प्रवक्ता।
सरकार का पक्ष
सरकार का दावा है कि वक्फ संशोधन का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह विधेयक वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा को मजबूत करेगा और अनियमितताओं पर रोक लगाएगा।
आगे की प्रक्रिया
जेपीसी को अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए 2025 के बजट सत्र तक का समय दिया गया है। इस दौरान समिति सभी पक्षों से परामर्श करेगी।
यह देखना दिलचस्प होगा कि मौलाना मदनी और विपक्षी दलों की आपत्तियों को समिति कितनी गंभीरता से लेती है और सरकार संशोधन पर क्या कदम उठाती है।

विशेषज्ञों का कहना:
विधेयक ने अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर असंतोष को गहराया है। यह मामला न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील बन गया है।
“सरकार को सभी हितधारकों के साथ समन्वय करके इस विवाद को सुलझाना चाहिए,” – संवैधानिक विशेषज्ञ।
यह विवाद न केवल धार्मिक स्वतंत्रता बल्कि देश की सामाजिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डाल सकता है। क्या सरकार इसे पारित कराने में सफल होगी, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
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