विदेश यात्राएं तो खूब हुईं, समर्थन मगर गूगल मैप पर भी नहीं दिखा — अब धर्मगुरुओं से उम्मीद
जालना | विशेष संवाददाता
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अॅड. महेश धन्नावत ने भारत की विदेश नीति को लेकर एक चुटीला और विचारणीय सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री और सांसद जितनी बार विदेश गए हैं, उतनी बार तो शायद लोग अपने चाचा-ताऊ से भी नहीं मिलते।
राजनीतिक दौरों से क्या निकला? — फोटो, फूल और शून्य समर्थन
धन्नावत ने कहा कि विदेश दौरों से अगर कुछ मिला, तो वो हैं — फोटो। कभी हाथ मिलाते, कभी स्मारक दिखाते, कभी गले लगते। लेकिन जब बात आई समर्थन की, तो सबने चुप्पी साध ली।
अब सांसद नहीं, साधु-संत भेजें विदेश
उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि सांसदों के बदले अगर हम साधु-संत और बुद्ध धर्म प्रचारक विदेश भेजें तो बेहतर हो सकता है। ये लोग भारत की छवि एक शांति और करुणा के देश के रूप में पेश कर सकते हैं — जो शायद किसी विदेशी को प्रभावित कर दे।
योग, ध्यान और गीता से हो सकता है बदलाव
धन्नावत ने कहा कि आज पूरी दुनिया योग और ध्यान की ओर देख रही है। अगर हम अपनी विदेश नीति में ओम शांति ओम जैसे तत्व मिला दें, तो शायद हमारी बात सुनी भी जाए।
यह दृष्टिकोण भले ही मज़ाकिया लगे, लेकिन यह गंभीर प्रश्न खड़ा करता है — क्या अब समय आ गया है कि हम ‘Power Suits’ के बदले ‘Safron Robes’ आज़माएं?

