रूठने-मनाने की मीठी नोकझोंक पर बने हिंदी फिल्मी गीतों में ‘तुम रूठी रहो, मैं मनाता रहूं’ का नाम सबसे ऊपर आता है। 1961 की फिल्म ‘आस का पंछी’ का यह सदाबहार गीत लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज में आज भी उतना ही ताजा लगता है, जितना छह दशक पहले था।

एक नजर में: गीत की पूरी जानकारी
- फिल्म: आस का पंछी (1961)
- गायक: लता मंगेशकर और मुकेश
- गीतकार: हसरत जयपुरी
- संगीत: शंकर-जयकिशन
- कलाकार: राजेंद्र कुमार और वैजयंतीमाला
- निर्देशक: मोहन कुमार | निर्माता: जे. ओमप्रकाश
रूठने-मनाने का सबसे प्यारा अंदाज
यह गीत प्रेमी-प्रेमिका के बीच की उस हल्की-फुल्की नाराजगी को दिखाता है, जिसमें शिकवे भी प्यार का हिस्सा बन जाते हैं। हसरत जयपुरी ने सीधे-सादे शब्दों में यह भाव पिरोया कि रूठी हुई अदाएं भी प्यार को और गहरा कर देती हैं। यही वजह है कि यह गीत आज भी ‘रूठना-मनाना’ थीम वाले गीतों की हर सूची में शामिल रहता है।
लता-मुकेश की जोड़ी और शंकर-जयकिशन का जादू
लता मंगेशकर की मधुर, चंचल आवाज और मुकेश की सीधी दिल को छूने वाली गायकी ने इस डुएट को खास बना दिया। शंकर-जयकिशन उस दौर के सबसे सफल संगीतकारों में थे और हसरत जयपुरी व शैलेंद्र के साथ उनकी टीम ने अनगिनत यादगार गीत दिए। ‘आस का पंछी’ के बाकी गीतों में भी हसरत जयपुरी और शैलेंद्र दोनों के बोल हैं।
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राजेंद्र कुमार और वैजयंतीमाला पर फिल्माया गया
परदे पर यह गीत राजेंद्र कुमार और वैजयंतीमाला पर फिल्माया गया था। मोहन कुमार के निर्देशन में बनी ‘आस का पंछी’ उनकी पहली निर्देशित फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म के बारे में और जानकारी विकिपीडिया पर पढ़ी जा सकती है।
आज भी क्यों पसंद किया जाता है यह गीत
सरल धुन, साफ-सुथरे बोल और दो महान आवाजों का मेल — यही इस गीत की ताकत है। रेडियो, पुराने गीतों के कार्यक्रमों और सोशल मीडिया रील्स तक, यह गीत नई पीढ़ी तक भी पहुंच रहा है। ‘सदाबहार गीत’ श्रृंखला में हम ऐसे ही यादगार गीतों की कहानी आप तक लाते रहेंगे।
प्रस्तुति: रश्मि बागड़ी, न्यूज़नेशन ऑनलाइन
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