न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर नई बहस
नई दिल्ली / जालना : राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा 12 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की ओर निकाले गए मार्च पर लगभग 200 वकीलों ने आपत्ति जताई है। 13 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) को भेजे गए पत्र में मार्च की निंदा का प्रस्ताव पारित करने की मांग की गई। जालना के एडवोकेट महेश सीताराम धन्नावत ने भी न्यायिक स्वतंत्रता के पक्ष में अपनी अलग आपत्ति व्यक्त की है। उनके इस पत्र के हस्ताक्षरकर्ता होने की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
12 अक्टूबर को क्या हुआ?
Verdictum की रिपोर्ट के अनुसार विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राजद के तेजस्वी यादव और अन्य नेता सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च में शामिल थे। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित बड़े पैमाने पर नाम हटाने और अनियमितताओं के खिलाफ याचिका दाखिल करने की पृष्ठभूमि में यह मार्च हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक नेता अदालत के फाइलिंग काउंटर तक भी पहुंचे।
लगभग 200 वकीलों की आपत्ति
13 अक्टूबर के पत्र में राहुल गांधी बनाम भारत निर्वाचन आयोग, डायरी नंबर 64196/2026 का उल्लेख किया गया। वकीलों का कहना है कि हजारों राजनीतिक समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन न्यायिक प्रक्रिया पर अप्रत्यक्ष दबाव डालने का आभास पैदा कर सकता है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि प्रत्येक नागरिक को अपने कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने का संवैधानिक अधिकार है। इस अधिकार का प्रयोग न्यायपालिका की गरिमा, स्वतंत्रता और संस्थागत सम्मान के साथ होना चाहिए।
उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों के लिए आशंका
पत्र में कहा गया कि याचिका दाखिल करना चुनावी नामांकन के साथ निकाले जाने वाले राजनीतिक जुलूस जैसा नहीं होना चाहिए। यदि प्रभावशाली वादकारी बड़ी संख्या में समर्थकों और वाहनों के काफिलों के साथ अदालतों में आने लगें, तो ऐसी प्रवृत्ति उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों तक फैल सकती है। वकीलों ने कहा कि राजनीतिक दल या व्यक्ति कोई भी हो, न्यायपालिका पर अनुचित प्रभाव का आभास देने वाले व्यवहार को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात का अनुरोध
रिपोर्ट के अनुसार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की प्रशासनिक मुलाकात के अनुरोध को शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत का हवाला देते हुए अस्वीकार किया। इस मुलाकात में निर्वाचन आयोग, छात्रों की गिरफ्तारी और परिवहन में बाधा जैसे मुद्दों पर ज्ञापन देना प्रस्तावित था। वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी और गौरव भाटिया ने भी अदालत में भीड़ जुटने से संबंधित याचिका दाखिल किए जाने की जानकारी दी। न्यायालय ने संबंधित रिट याचिका पर सुनवाई की बात कही, ऐसा रिपोर्ट में बताया गया।
10 अक्टूबर के प्रदर्शनों से जुड़ी अलग कार्यवाही
मूल रिपोर्ट में एक विशेष रविवार की सुनवाई का भी उल्लेख है, जिसमें अदालत ने अपने आदेशों के कथित अनुपालन न होने पर केंद्र और दिल्ली के अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना याचिका में नोटिस जारी किया था। रिपोर्ट के मुताबिक अदालत ने पहले 10 अक्टूबर के प्रदर्शनों से पहले मेट्रो और रेल सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध पर पुनर्विचार का निर्देश दिया था। यह 12 अक्टूबर के मार्च पर वकीलों की आपत्ति से अलग न्यायिक संदर्भ है।
एडवोकेट महेश धन्नावत का स्वीकृत बयान
राहुल गांधी हों या देश का कोई अन्य राजनीतिक नेता, कानून के समक्ष सभी बराबर हैं। न्यायालय जाने और न्याय मांगने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है, लेकिन हजारों समर्थकों के साथ न्यायालय के सामने राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन करना उचित नहीं है। न्यायपालिका को संविधान, कानून और साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने चाहिए। किसी राजनीतिक दल की भीड़ या लोकप्रियता न्यायिक निर्णय का आधार नहीं बन सकती। न्यायालयों की गरिमा और स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए सभी राजनीतिक दलों पर समान नियम लागू होने चाहिए।
Adv. Mahesh Sitaram Dhannawat, B.Com., LL.M., Jalna, Maharashtra
लोकतांत्रिक अधिकारों का संतुलन
शांतिपूर्ण प्रदर्शन और न्यायालय तक पहुंच नागरिकों के महत्वपूर्ण अधिकार हैं। साथ ही अदालतों को धमकी, व्यवधान या अनुचित दबाव से बचाना भी जरूरी है। वकीलों के पत्र में व्यक्त आरोप और आशंकाएं अपने आप में न्यायालय का अंतिम निष्कर्ष नहीं हैं। रिपोर्ट से यह स्थापित नहीं होता कि मार्च ने वास्तव में न्यायिक निर्णय को प्रभावित किया।
चित्र: AI-निर्मित प्रतीकात्मक दृश्य; वास्तविक घटना का फोटो नहीं।
Source: Verdictum, Aastha Kaushik, 14 October 2026.
Discover more from NewsNation Online
Subscribe to get the latest posts sent to your email.















Leave a Reply