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अब जनसंख्या नियंत्रण नहीं, घटती प्रजनन दर पर ध्यान दें! एड. महेश धन्नावत की अपील

Three-language infographic about India's fertility rate and Supreme Court reconsideration of two-child norm
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कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

जालना, विशेष संवाददाता: भारत की कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आने के बीच सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत चुनावों में दो बच्चों की शर्त की प्रासंगिकता पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। अदालत ने संबंधित संवैधानिक प्रश्न बड़ी पीठ के विचार के लिए भेजा है।

वर्ष 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य फैसले के बाद बदली जनसांख्यिकीय स्थिति का मूल्यांकन आवश्यक है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी दो-बच्चों का नियम अंतिम रूप से रद्द नहीं किया है। महाराष्ट्र के पंचायत चुनाव विवाद ने महिलाओं की प्रजनन स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक भागीदारी के मुद्दे भी सामने रखे हैं।

भारत की कुल प्रजनन दर लगभग 1.9 बताई गई है, जबकि पीढ़ीगत प्रतिस्थापन का सामान्य मानक 2.1 है। इसका अर्थ यह नहीं कि देश की कुल आबादी तुरंत घट रही है। दीर्घकालीन नीति में रोजगार, शिक्षा, वृद्ध आबादी और स्वास्थ्य का संतुलन जरूरी है।

एडवोकेट महेश धन्नावत ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन केवल पंचायत चुनाव तक सीमित नहीं, बल्कि देश के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। एक समय जनसंख्या नियंत्रण आवश्यक समझा जाता था, लेकिन अब घटती प्रजनन दर को देखते हुए सरकार को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए। बांझपन के उपचार, मातृत्व सुरक्षा, बाल देखभाल, युवा दंपतियों को आर्थिक सहयोग और प्रजनन स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हर परिवार को संतान के संबंध में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार है। देश को केवल बड़ी आबादी नहीं, बल्कि स्वस्थ और सक्षम भावी पीढ़ी चाहिए।”

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किफायती आवास, सुरक्षित रोजगार, मातृत्व सुविधाएं, बाल देखभाल और इच्छुक लोगों के लिए प्रजनन उपचार बढ़ाना सकारात्मक कदम होंगे। किसी परिवार पर अधिक बच्चे पैदा करने का दबाव डालना समाधान नहीं है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और महिला अधिकारों का सम्मान करते हुए नीति बननी चाहिए।

Source: Law Trend


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