लखनऊ / जालना: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने सीबीआई के एक मामले में अभियोजन स्वीकृति को बार-बार चुनौती देने वाले पूर्व बैंक प्रबंधक की याचिका खारिज कर ₹50,000 का खर्च लगाया है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने 13 अक्टूबर 2026 के निर्णय में फोरम शॉपिंग और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
मामले की पृष्ठभूमि
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शिकायत में शिवांग कार्पेट प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े 15 निर्यात बिलों में लगभग ₹7.40 करोड़ की कथित धोखाधड़ी और धन के दुरुपयोग का आरोप था। सीबीआई ने छह लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया, जिनमें पूर्व शाखा प्रबंधक हेमंत कुमार प्रसाद भी थे। आरोप था कि उन्होंने निर्धारित बैंकिंग प्रक्रियाओं का पालन किए बिना फोटोकॉपी के आधार पर 12 निर्यात बिलों की प्रक्रिया की। इस आदेश में आरोपों पर दोषसिद्धि का निर्णय नहीं हुआ।
स्वीकृति को दोबारा चुनौती
29 सितंबर 2021 को अभियोजन स्वीकृति दी गई थी। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 16 जून 2026 को इसके खिलाफ याचिका खारिज की। इसके बाद वही मुद्दा निचली अदालत में उठाया गया और फिर धारा 482 सीआरपीसी तथा धारा 528 बीएनएसएस के अंतर्गत उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल हुई। याचिकाकर्ता ने लगभग 27 महीने की देरी और स्वीकृति देने में स्वतंत्र विवेक के अभाव का तर्क दिया।
न्यायालय ने क्या कहा?
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्वीकृति में देरी मात्र से आपराधिक कार्यवाही अपने आप रद्द नहीं होती। खंडपीठ के निर्णय से असहमति होने पर उचित अपीलीय रास्ता अपनाना चाहिए, न कि उसी मुद्दे को अलग-अलग कार्यवाहियों में दोहराना चाहिए। ₹50,000 की राशि 30 दिनों में जमा करने का निर्देश दिया गया, जिसे लखनऊ के बालिका गृह को भेजा जाना है। भुगतान नहीं होने पर भू-राजस्व बकाया की तरह वसूली हो सकती है।
एडवोकेट महेश धन्नावत का पक्षकारों के लिए संदेश
“न्याय मांगने का अधिकार हर नागरिक को है, लेकिन पहले से तय मुद्दे को बार-बार अलग-अलग अदालतों में उठाना उचित उपाय नहीं है। नया मुकदमा शुरू करने से पहले पुराने आदेश, अपील के विकल्प, समय-सीमा, अधिकार क्षेत्र और संभावित खर्च का अध्ययन करना चाहिए। सही कानूनी सलाह से अनावश्यक मुकदमेबाजी और आर्थिक नुकसान से बचा जा सकता है।”
— एडवोकेट महेश सीताराम धन्नावत, B.Com., LL.M., जालना।
आम जनता के लिए सीख: वैध अपील और नई परिस्थितियों में उचित कार्यवाही का अधिकार बना रहता है। लेकिन बिना ठोस कानूनी आधार के पहले से निर्णीत मुद्दे को दोहराने पर आर्थिक खर्च लगाया जा सकता है।
मामला: Hemant Kumar Prasad v. Prosecution Sanctioning Authority Through General Manager, SBI Lucknow and Others; Application U/S 528 BNSS No. 6813 of 2026. स्रोत: Law Trend.
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