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अदालतों पर भी आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां

कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र में किसी भी संस्था या अधिकार के सामने आंख मूंदकर झुकने की प्रवृत्ति से बचना जरूरी है. उन्होंने कानून की पढ़ाई को सिर्फ धाराओं और कानूनी प्रावधानों तक सीमित रखने के बजाय संविधान के मूल्यों, स्वतंत्र सोच और सवाल पूछने की संस्कृति से जोड़ने पर जोर दिया.

जस्टिस भुइयां ने यह बात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली के 30 अगस्त 2026 को आयोजित एलएलएम कार्यक्रम के 13वें दीक्षांत समारोह में कही. कार्यक्रम में दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक चौधरी समेत कई न्यायविद, शिक्षाविद और कानून के क्षेत्र से जुड़े लोग मौजूद रहे. विश्वविद्यालय के आधिकारिक विवरण के मुताबिक जस्टिस भुइयां ने स्वतंत्र विचार, सवाल करने, सम्मानजनक बहस और असहमति को लोकतंत्र के लिए जरूरी बताया.

विश्वविद्यालय सिर्फ ज्ञान देने की जगह नहीं

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि विधि विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी तक ज्ञान पहुंचाने तक सीमित नहीं है. विश्वविद्यालय ऐसे स्थान होने चाहिए जहां अलग-अलग विचारों को परखा जाए, सवाल पूछे जाएं और तर्क के आधार पर मतभेदों पर चर्चा हो.

उनके मुताबिक स्वस्थ शैक्षणिक माहौल में सभी लोगों का एक ही राय रखना जरूरी नहीं है. अलग विचार रखने, असहमति जताने और उस पर खुलकर चर्चा करने की आजादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करती है.

अदालतों पर भी सवाल पूछने की संस्कृति जरूरी

जस्टिस भुइयां ने न्यायपालिका समेत किसी भी अधिकार के सामने आंख मूंदकर झुकने की प्रवृत्ति से बचने की बात कही. उनका जोर इस बात पर था कि लोकतंत्र में सवाल पूछना, तर्क करना और सम्मानजनक असहमति व्यक्त करना नागरिक और संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है.

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और न्याय संविधान के केवल किताबी या अमूर्त शब्द नहीं हैं, बल्कि कानून की असली बुनियाद हैं. कानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों को धाराओं के साथ-साथ उन संवैधानिक मूल्यों को भी समझना चाहिए जिनके आधार पर कानून काम करता है.

न्यायपालिका और शिक्षण संस्थाएं एक-दूसरे की पूरक

जस्टिस भुइयां ने न्यायपालिका और अकादमिक क्षेत्र को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक बताया. कानून विश्वविद्यालयों में होने वाला शोध अदालतों के कामकाज, न्यायिक फैसलों और कानूनी नीतियों का गहराई से विश्लेषण कर सकता है. इससे कानून और न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.

सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार जस्टिस उज्ज्वल भुइयां 14 जुलाई 2023 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने थे. सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक प्रोफाइल यहां देखें.

महेश धन्नावत ने बताया लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण संदेश

जस्टिस भुइयां के विचारों का स्वागत करते हुए विधि विशेषज्ञ एडवोकेट महेश धन्नावत ने कहा कि यह सोच लोकतंत्र को मजबूत करने वाली और दूरगामी असर रखने वाली है. उनके मुताबिक न्यायव्यवस्था के फैसलों और संस्थागत कामकाज पर सवाल पूछने तथा निर्भय वैचारिक मंथन की संस्कृति सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.

धन्नावत ने कहा कि महाराष्ट्र के विधि महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और न्यायालयों में भी स्वतंत्र चिंतन, मतस्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है. उन्होंने इसे समय की मांग बताया.

एडवोकेट महेश धन्नावत ने इससे पहले भी गणेशोत्सव की तैयारियों में समय से पहले प्रशासन और आयोजन समितियों के बीच समन्वय की जरूरत पर जोर दिया था. हैदराबाद मॉडल और एडवोकेट महेश धन्नावत की मांग वाली हमारी खबर पढ़ें.

क्यों महत्वपूर्ण है जस्टिस भुइयां का संदेश?

कानून और लोकतंत्र की समझ सिर्फ अदालतों के फैसलों को पढ़ने से पूरी नहीं होती. इसके लिए संविधान के मूल सिद्धांतों, नागरिक स्वतंत्रता, असहमति और संस्थाओं की जवाबदेही को समझना भी जरूरी है. जस्टिस भुइयां का संदेश इसी व्यापक सोच की ओर इशारा करता है, जिसमें कानून की शिक्षा के साथ आलोचनात्मक सोच और जिम्मेदार बहस को भी अहम माना जाता है.


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Imran Siddiqui
Imran Siddiqui is a journalist based in Jalna, Maharashtra, and district representative for Navbharat (previously with Lokmat Samachar). He edits NewsNation Online, covering Jalna, Marathwada, Maharashtra and India, and ImranJalna, covering Islamic knowledge and Muslim-world news in English, Hindi and Urdu.

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