नई दिल्ली. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कहा है कि भारत का चुनाव आयोग किसी एक व्यक्ति से नहीं चलता. मुख्य चुनाव आयुक्त सहित तीनों सदस्यों की निर्णय प्रक्रिया में भूमिका होती है. सहमति नहीं बनने पर बहुमत से फैसला किया जाता है.
कोलकाता में 5 नवंबर को हाशिम अब्दुल हलीम स्मृति व्याख्यान के दौरान कुरैशी ने यह बात कही. उनका बयान मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और आयोग के भीतर कथित मतभेदों की खबरों के बीच आया है.
तीन में से दो सदस्यों की राय से फैसला
कुरैशी के मुताबिक, आयोग को पहले सर्वसम्मति बनाने का प्रयास करना चाहिए. यदि ऐसा संभव न हो, तो दो चुनाव आयुक्तों का बहुमत निर्णय तय कर सकता है, भले ही मुख्य चुनाव आयुक्त उस राय से असहमत हों.
14 आपत्तियों की रिपोर्ट पर चर्चा
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के हवाले से द वायर ने बताया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कुछ कथित एकतरफा फैसलों पर दस महीने में 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं. इनमें फॉर्म-6, चुनावी सॉफ्टवेयर और प्रशासनिक फैसलों से जुड़े विषय शामिल बताए गए. ये रिपोर्ट किए गए दावे हैं, किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में इन्हें नहीं देखा जाना चाहिए.
चुनाव आयोग ने आंतरिक सुझावों और टिप्पणियों को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया है और कहा है कि हाल के फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं.
2008 के जम्मू-कश्मीर चुनाव का उदाहरण
कुरैशी ने याद दिलाया कि 2008 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के समय तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी की राय बाकी दो आयुक्तों से अलग थी. कुरैशी और नवीन चावला समय पर चुनाव कराने के पक्ष में थे. कुरैशी के अनुसार, बाद में बहुमत की राय स्वीकार की गई और चुनाव संपन्न हुए.
कानून में क्या प्रावधान है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुसार, जहां तक संभव हो आयोग के कामकाज में सर्वसम्मति होनी चाहिए. मतभेद होने पर बहुमत की राय मान्य होती है. इस व्यवस्था का उद्देश्य निर्णय प्रक्रिया में सभी सदस्यों की भागीदारी सुनिश्चित करना है.
स्रोत: द वायर हिंदी की रिपोर्ट | भारत निर्वाचन आयोग | NewsNationOnline की अन्य खबरें.
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