नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026: कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जरूरी दवाओं की कीमतों में भारी अंतर का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने कैंसर की एक दवा का उदाहरण रखा गया, जिसकी कीमत रिटेलर के लिए करीब ₹2,700 बताई गई, जबकि उसका MRP करीब ₹27,000 बताया गया। यानी दोनों कीमतों के बीच करीब दस गुना का अंतर है।
सुप्रीम कोर्ट ने कीमतों के भारी अंतर पर उठाए सवाल
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान दवा की कीमतों और मरीजों से वसूली जाने वाली रकम का मुद्दा उठा। अदालत ने इस तरह के बड़े अंतर पर गंभीर चिंता जताई और सवाल किया कि मरीजों तक पहुंचने से पहले दवा की कीमत इतनी अधिक कैसे हो जाती है।
सुनवाई में यह भी चर्चा हुई कि दवा की अंतिम कीमत में निर्माता, स्टॉकिस्ट और रिटेलर की भूमिका तथा अलग-अलग स्तरों पर जुड़ने वाले मार्जिन को किस तरह नियंत्रित किया जा सकता है।
कैंसर मरीजों पर इलाज का भारी आर्थिक बोझ
कैंसर का इलाज अक्सर लंबे समय तक चलता है और इसमें महंगी दवाओं की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में दवाओं की कीमत में कई गुना अंतर मरीज और उसके परिवार के लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन सकता है। सुनवाई के दौरान मरीजों और उनके परिवारों की आर्थिक परेशानियों का मुद्दा भी सामने आया।
दवा कंपनियों के साथ सप्लाई चेन पर भी नजर
सुनवाई में दवा कंपनियों की ओर से यह पक्ष सामने आया कि निर्माता स्तर पर मिलने वाली कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली अंतिम कीमत के बीच स्टॉकिस्ट तथा रिटेल स्तर की पूरी सप्लाई चेन को देखना जरूरी है। इसलिए केवल निर्माता के मार्जिन को देखकर पूरे मूल्य अंतर का आकलन नहीं किया जा सकता।
तुकाराम मुंढे ने भी मेडिकल उपकरणों की कीमतों का मुद्दा उठाया
मेडिकल क्षेत्र में कीमतों के अंतर का यह मुद्दा महाराष्ट्र के FDA आयुक्त तुकाराम मुंढे द्वारा उठाए गए सवालों से भी जुड़ता है। रिपोर्टों के अनुसार, अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कुछ मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और मरीजों के बिल में दर्ज कीमत के बीच बड़ा अंतर सामने आया था।
बताए गए उदाहरणों में करीब ₹11 में खरीदे गए IV सेट के लिए मरीज के बिल में लगभग ₹325 और करीब ₹6 की सिरिंज के लिए ₹57 तक वसूले जाने की बात सामने आई थी। इन आंकड़ों को अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली कुछ वस्तुओं के विशिष्ट उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि हर अस्पताल की सामान्य स्थिति के रूप में।
NPPA और दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था भी चर्चा में
मामले में दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों पर निगरानी, मूल्य नियंत्रण और सप्लाई चेन में मार्जिन से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण हैं। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) की भूमिका भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है।
जन औषधि केंद्रों का भी उल्लेख
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सस्ती दवाओं की उपलब्धता के लिए जन औषधि केंद्रों का उल्लेख किया गया। हालांकि, यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जो जरूरी दवाएं इन केंद्रों पर उपलब्ध नहीं हैं, उनके लिए मरीजों को बाजार में किस कीमत पर दवा खरीदनी पड़ती है।
29 सितंबर को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 29 सितंबर 2026 को सूचीबद्ध किया है। अगली सुनवाई में दवाओं की कीमतों, मूल्य नियंत्रण व्यवस्था और संबंधित पक्षों की दलीलों पर आगे चर्चा हो सकती है।
महत्वपूर्ण: ₹2,700 और ₹27,000 का आंकड़ा सुनवाई में सामने आए एक विशिष्ट कैंसर दवा के उदाहरण से संबंधित है। इसे सभी कैंसर दवाओं या सभी अस्पतालों की सामान्य कीमत के रूप में नहीं समझना चाहिए।

