प्राचीन यूनान के कानून शिक्षक प्रोटागोरस ने अपने छात्र यूएथलस से समझौता किया कि वह अपना पहला मुकदमा जीतने के बाद ही फीस देगा। विद्यार्थी ने पढ़ाई पूरी की लेकिन वकालत शुरू नहीं की। शिक्षक ने फीस के लिए मुकदमा किया। गुरु का तर्क था कि वह जीतेंगे तो अदालत फीस दिलाएगी और हारेंगे तो शिष्य का पहला मुकदमा जीतना करार की शर्त पूरी कर देगा। शिष्य ने कहा कि वह जीतता है तो अदालत भुगतान का दावा खारिज करेगी और हारता है तो पहला मुकदमा न जीतने के कारण फीस देय नहीं होगी। इसे न्यायालय का विरोधाभास कहा जाता है। कानूनी दृष्टि से अहम प्रश्न है कि दावा दायर होने के समय भुगतान की शर्त पूरी हुई थी या नहीं। अदालत लागू कानून और समझौते के अनुसार दावे को समयपूर्व मान सकती है। यह दार्शनिक पहेली है, किसी आधुनिक न्यायालय का प्रमाणित फैसला नहीं। जालना के एडवोकेट महेश सीताराम धन्नावत, बी.कॉम., एलएल.एम., के संदर्भ में विचारार्थ प्रश्न है कि अदालत समझौते के शब्दों के साथ पक्षकारों के आचरण और न्यायसंगत परिणाम को कितना महत्व दे? यह प्रत्यक्ष सत्यापित बयान नहीं, संपादकीय कानूनी चर्चा है। आप न्यायाधीश होते तो क्या फैसला देते? शिवकृपा, कालीकुर्ती, आर.पी. रोड, जालना 431203। मोबाइल: 9326704647।
Source background: Paradox of the Court
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