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सात घंटे पानी के लिए, तो बुलेट ट्रेन किसके लिए? मराठवाड़ा के बच्चों का मार्मिक सवाल!

पाण्यासाठी रांगेत बसलेली मुले आणि महिला, पार्श्वभूमीत बुलेट ट्रेन; नूतन दीदी यांचा फोटो नाही
कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

जालना | विशेष संवाददाता

पहले हर घर में पानी, हर बच्चे को शिक्षा और हर किसान को सम्मानजनक जीवन का अवसर — नूतन दीदी का संदेश।

भारत बुलेट ट्रेन, आधुनिक राजमार्गों, हवाई अड्डों और डिजिटल तकनीक के माध्यम से प्रगति की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन इसी देश के मराठवाड़ा क्षेत्र के कुछ गांवों में बच्चों को पानी की प्रतीक्षा में दिन के लगभग सात घंटे बिताने पड़ते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट ‘Marathwada kids spend 7 hrs of their day waiting for water’ विकास की प्राथमिकताओं पर एक गंभीर प्रश्न उठाती है। जिस देश में एक बच्चे को दो घड़े पानी के लिए सात घंटे लगाने पड़ें, वहां विकास का वास्तविक अर्थ क्या होना चाहिए?

सुबह तीन बजे से पानी की कतार

महाराष्ट्र के धाराशिव जिले के गौर गांव में महिलाएं और बच्चे सुबह तीन बजे से सामुदायिक नल पर पानी के लिए कतार लगाते हैं। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 15 वर्षीय यश काकड़े और उसके मित्र प्रतिदिन कम से कम सात घंटे पानी प्राप्त करने में बिताते हैं। सुबह चार बजे उठना, साइकिल से स्कूल के पास के सार्वजनिक नल तक जाना, लंबे समय तक इंतजार करना और पानी घर लाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए, उनमें पानी के बर्तन हैं। यह केवल जलसंकट नहीं, बचपन, शिक्षा, स्वास्थ्य और समान अवसरों का प्रश्न है।

बुलेट ट्रेन भी हो, लेकिन गांव के नल में पानी भी आए

तेज रेल, आधुनिक परिवहन और तकनीक में निवेश दीर्घकालीन आर्थिक विकास के लिए उपयोगी हो सकता है। फिर भी इनके साथ सुरक्षित पेयजल, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती की मूलभूत सुविधाओं को पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए। एक ओर सैकड़ों किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलने वाली रेल का सपना है और दूसरी ओर दो घड़े पानी के लिए घंटों इंतजार करते बच्चे। प्रश्न बुलेट ट्रेन का विरोध करने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि आधुनिक भारत की प्रगति अंतिम गांव तक कब पहुंचेगी।

नूतन दीदी की भावपूर्ण अपील

जालना में नूतन दीदी के नाम से परिचित नूतन देसाई का संदेश है: “भारत प्रगति करे, बुलेट ट्रेन चले और विश्व की श्रेष्ठ तकनीक हमारे देश में आए, इस पर प्रत्येक भारतीय को गर्व होगा। लेकिन जिस देश के छोटे बच्चों को पानी के लिए सात घंटे कतार में खड़ा रहना पड़ता है, उन बच्चों का बचपन हम कब लौटाएंगे? बच्चों के हाथों में घड़ा नहीं, पुस्तक होनी चाहिए। उनकी आंखों में पानी की चिंता नहीं, उज्ज्वल भविष्य के सपने होने चाहिए। विकास की रफ्तार जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है कि उसका लाभ अंतिम जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचे। आधुनिक भारत का निर्माण करते हुए पानी के लिए संघर्ष करने वाली हर मां और हर बच्चे को न्याय दिलाने की सामाजिक जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए।”

जलसंकट बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित करता है

पानी की कतारों में घंटों खड़े रहने से बच्चों का शारीरिक श्रम बढ़ता है और पढ़ाई के लिए समय घटता है। नींद की कमी, स्कूल पहुंचने में देरी, थकान और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21ए छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। इसलिए पानी के अभाव से शिक्षा में बाधा आने पर इसे बाल अधिकारों के दृष्टिकोण से भी देखना चाहिए।

किसानों और महिलाओं की दोहरी कठिनाई

मराठवाड़ा का ग्रामीण जीवन बड़े पैमाने पर कृषि पर निर्भर है। अपर्याप्त वर्षा, भूजल स्तर में गिरावट और जलस्रोतों पर दबाव से खेती के साथ परिवारों का दैनिक जीवन भी प्रभावित होता है। पानी के लिए प्रतीक्षा करती महिलाओं और बच्चों की तस्वीरें इस संकट के मानवीय प्रभाव को दिखाती हैं। एक मां अपने बच्चे के लिए पीने के पानी की चिंता करे या उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की?

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संविधान और सम्मान से जीने का अधिकार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार की न्यायिक व्याख्या में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता को भी महत्वपूर्ण माना गया है। पानी की आपूर्ति केवल एक सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, मानवीय गरिमा और सम्मानपूर्ण जीवन से जुड़ा विषय है। जल योजनाओं की वास्तविक कार्यक्षमता, गांववार उपलब्धता, स्रोतों की स्थिरता और वितरण में बाधाओं की नियमित समीक्षा आवश्यक है।

घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस कदम जरूरी

जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, पाइपलाइन रिसाव रोकना, गांववार आपूर्ति योजना, जलस्रोतों की रक्षा और स्कूलों में पर्याप्त पेयजल की व्यवस्था प्राथमिकता बननी चाहिए। जहां बच्चों को पानी के लिए कई घंटे लगाने पड़ते हैं, वहां प्रशासन तत्काल निरीक्षण कर अस्थायी राहत और स्थायी समाधान सुनिश्चित करे। स्थानीय निकाय, सामाजिक संगठन, उद्योग और नागरिक भी इस प्रयास में साथ आ सकते हैं।

असली प्रगति का पैमाना क्या है?

बुलेट ट्रेन की गति आधुनिक तकनीक की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन हर गांव के नल में नियमित पानी, हर बच्चे को शिक्षा और हर परिवार को सम्मान से जीने का अवसर मिलना भी विकास का अनिवार्य पैमाना है। पानी की कतार में खड़ा बच्चा पूछ रहा है: ‘मेरे देश में बुलेट ट्रेन दौड़ेगी, लेकिन मेरे घर के नल में पानी कब आएगा?’ इसका उत्तर केवल भाषणों में नहीं, जमीन पर किए गए काम में मिलना चाहिए। विकसित भारत वही होगा जहां किसी बच्चे का बचपन पानी की कतार में न खो जाए।

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया, टाइम्स सिटी — ‘Marathwada kids spend 7 hrs of their day waiting for water’। उपलब्ध अखबार की कटिंग पर आधारित।


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